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त्रिकोणीय गठबंधन: रूस-उत्तर कोरिया और चीन बदल रहे विश्व शक्ति संतुलन, पश्चिमी देशों के लिए नई चुनौती
Wed, 16 Jul 2025 06:09 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, वाशिंगटन/बीजिंग
अमर उजाला नेटवर्क, वाशिंगटन/बीजिंग
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Wed, 16 Jul 2025 06:09 AM IST
सार
अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक, यह त्रिकोणीय गठजोड़ वैश्विक भू-राजनीतिक संतुलन को नई दिशा देने की क्षमता रखता है। रूस इसका सैन्य केंद्र है। यूक्रेन युद्ध में उलझने और पश्चिमी प्रतिबंधों से घिरने के बावजूद वह हथियारों व ऊर्जा संसाधनों की व्यापक पूंजी रखता है।
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किम जोंग उन और व्लादिमीर पुतिन, शी जिनपिंग
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
दुनिया भर के शीर्ष कूटनीतिज्ञों, रक्षा विश्लेषकों और सामरिक संस्थानों की नजर रूस, उत्तर कोरिया और चीन के त्रिकोणीय गठबंधन पर टिकी हैं। इस गठजोड़ को एक ऐसी रणनीतिक धुरी के रूप में देखा जा रहा है जो वैश्विक शक्ति संतुलन को नए सिरे से गढ़ सकती है। रूस-यूक्रेन युद्ध, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सैन्य दबाव और पश्चिमी प्रतिबंधों की पृष्ठभूमि में यह त्रिकोण केवल सैन्य लेन-देन नहीं बल्कि भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण की एक निर्णायक धारा भी बनता जा रहा है।
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अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक, यह त्रिकोणीय गठजोड़ वैश्विक भू-राजनीतिक संतुलन को नई दिशा देने की क्षमता रखता है। रूस इसका सैन्य केंद्र है। यूक्रेन युद्ध में उलझने और पश्चिमी प्रतिबंधों से घिरने के बावजूद वह हथियारों व ऊर्जा संसाधनों की व्यापक पूंजी रखता है। उत्तर कोरिया, अंतरराष्ट्रीय अलगाव और कठोर प्रतिबंधों के बावजूद गोला-बारूद और पारंपरिक हथियारों के निर्माण में बेहद दक्ष है। वहीं विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, तकनीकी प्रभुत्व और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर मजबूत पकड़ के साथ चीन इस समूह की आर्थिक रीढ़ है। चीन सतर्क-संतुलित सार्वजनिक भूमिका जरूर निभा रहा है, लेकिन उसका बैक-चैनल सपोर्ट इस गठबंधन को रणनीतिक गहराई प्रदान करता है।
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भारत के लिए रणनीतिक संकेत
फ्रांस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम्मानुएल बोन और ईयू के विदेश नीति प्रमुख जोसप बॉरेल कहते हैं कि भारत-रूस संबंध दशकों पुराने हैं, लेकिन रूस की चीन-उत्तर कोरिया से निकटता भारत को प्रभावित कर सकती है। यूक्रेन युद्ध में रूसी रक्षा आपूर्ति प्रभावित हो रही है, यह भारत की रक्षा तैयारी पर असर डालेगी। भारत को अब अमेरिका, यूरोप, के अन्य सहयोगियों के बीच संतुलन साधने की नीति अपनानी होगी।
चीन की चुप्पी में छुपी रणनीति
चीन ने अभी तक किसी खुले सैन्य समर्थन की घोषणा नहीं की है, लेकिन वस्तुतः उसकी आपूर्ति शृंखला, आर्थिक निवेश और कूटनीतिक सुरक्षा कवच रूस की युद्ध-क्षमता को मजबूती दे रहा है। एशिया विशेषज्ञ, जर्मन मार्शल फंड बोनी ग्लेसर कहते हैं कि चीन औपचारिक रूप से रूस का युद्ध सहयोगी नहीं है, लेकिन उसकी आपूर्ति शृंखला और राजनयिक कवच रूस की लड़ाई को वैधता और संसाधन, दोनों दे रहे हैं। यह अमेरिका और सहयोगियों के लिए स्पष्ट रणनीतिक सिरदर्द है। यह त्रिकोणीय गठबंधन अब नई विश्व व्यवस्था में शक्ति के पुनर्वितरण की दीर्घकालिक परियोजना बनता जा रहा है। भारत सहित वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए बहुपक्षीय कूटनीति को सक्रिय करने और सामरिक दृष्टिकोण को फिर से परिभाषित करने का यही सही समय है।
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पश्चिमी देशों के लिए नई चुनौती
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों और कूटनीतिक सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार रूस, उत्तर कोरिया और चीन के बीच तेजी से बढ़ता सहयोग अब केवल द्विपक्षीय समझौतों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक अघोषित धुरी का रूप ले चुका है। हालांकि तीनों देशों ने अभी तक किसी औपचारिक सैन्य संधि की घोषणा नहीं की है, लेकिन युद्ध सामग्री की आपूर्ति, तकनीकी सहयोग और साझा अंतरराष्ट्रीय बयानों के जरिये यह त्रिकोण अब ठोस सामरिक उद्देश्य साधने की दिशा में बढ़ रहा है। इस धुरी का सबसे गंभीर प्रभाव पश्चिमी प्रतिबंध नीति पर पड़ सकता है। उनके लिए यह एक नई चुनौती है।