{"_id":"5fe9a8c98ebc3e3c4073dd6a","slug":"2020-weather-disasters-boosted-by-climate-change-report","type":"story","status":"publish","title_hn":"कैसे ‘क्लाइमेट ब्रेकडाउन’ का साल बन गया 2020?","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
कैसे ‘क्लाइमेट ब्रेकडाउन’ का साल बन गया 2020?
Mon, 28 Dec 2020 03:13 PM IST
अनिल पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कैनबरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कैनबरा
Published by: अनिल पांडेय
Updated Mon, 28 Dec 2020 03:13 PM IST
सार
- इस साल दस बड़ी आपदाओं के एवज में 150 अरब डॉलर का बीमा क्लेम
- ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से अब तूफान और चक्रवात अधिक शक्तिशाली हो गए हैं
- 2020 में अटलांटिक महासागर में रिकॉर्ड संख्या में चक्रवात उठे
विज्ञापन
पर्यावरण पर पड़ रहे दुष्प्रभाव
- फोटो : iStock
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
दुनिया में मौसम संबंधी आपदाएं किस तेजी से बढ़ रही हैं, साल 2020 इसकी मिसाल बना है। इस साल दस सबसे हानिकारक आपदाओं से हुए नुकसान के एवज में 150 अरब डॉलर का बीमा क्लेम किया गया है। ये रकम 2019 में हुए ऐसे कुल बीमा क्लेम से ज्यादा है। जानकारों के मुताबिक हर साल जिस मात्रा में बीमा कंपनियों को ऐसे नुकसान के बदले भुगतान करना पड़ा है, उससे जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक परिणाम लगातार अधिक स्पष्ट होते जा रहे हैं।
विज्ञापन
चैरिटी संस्था क्रिश्चियन एड की तरफ से जारी ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि उपरोक्त सबसे हानिकारक दस आपदाओं में साढ़े तीन हजार से अधिक लोगों की मृत्यु हुई, जब कि एक करोड़ 35 लाख लोग विस्थापित हुए। ये रिपोर्ट से इस साल जनवरी से नवंबर तक आई प्राकृतिक आपदाओं के बारे में है। यानी इसमें दिसंबर का आंकड़ा शामिल नहीं है। क्रिश्चियन एड ने इस साल हुए नुकसान के मद्देनजर 2020 को क्लाइमेट ब्रेकडाउन यानी जलवायु दुर्घटना का साल कहा है।
विज्ञापन
क्रिश्चियन एड ने ध्यान दिलाया है कि निम्न आय वाले देशों में जलवायु से जुड़े हादसों के लिए बीमा कराने का चलन नहीं है। इसलिए 2020 में इन देशों में जो नुकसान हुआ, उसका सिर्फ चार प्रतिशत हिस्सा बीमा के कवरेज में था। उच्च आय वाले देशों में 60 फीसदी ऐसा नुकसान बीमा कवरेज के अंदर था। इस रिपोर्ट में पिछले महीने जारी हुए एक अध्ययन का जिक्र किया गया है, जिसमें कहा गया था कि एशिया में बाढ़ हो या अफ्रीका में टिड्डियों का हमला या फिर यूरोप और अमेरिका में आए चक्रवात- 2020 में जलवायु परिवर्तन का असर दिखता रहा। ये अध्ययन ब्रिटिश मेडिकल जर्नल द लासेंट में छपा था।
विज्ञापन
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से अब तूफान और चक्रवात अधिक शक्तिशाली हो गए हैं। ये ज्यादा देर तक टिक रह हैं और इनके असर से अधिक तेज वर्षा हो रही है। 2020 में अटलांटिक महासागर में रिकॉर्ड संख्या में चक्रवात उठे। उनके कारण 400 से ज्यादा जानें गईं और 41 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। जानकारों ने अंदेशा जताया है कि आने वाले वर्षों में चक्रवातों के कारण और अधिक क्षति हो सकती है।
रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि चीन और भारत में लगातार दूसरे साल मानसून के दौरान आसामान्य मात्रा में बारिश हुई। इससे दोनों देशों को गंभीर बाढ़ का सामना करना पड़ा। बांग्लादेश में इतिहास की सबसे हानिकारक बाढ़ इस साल आई। एक समय ऐसा था, जब देश का एक चौथाई हिस्सा बाढ़ में डूबा हुआ था। उधर अमेरिका के कैलिफोर्निया, ऑस्ट्रेलिया, और रूस के साइबेरिया के जंगलों में भयानक आग लगी।
पिछले साल ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी अभूतपूर्व आग के कारण 20 फीसदी वन नष्ट हो गए थे। इसके अलावा लाखों जंगली जानवरों की मौत हो गई थी। वो आग 2020 के शुरुआती महीनों तक जारी रही। ऑस्ट्रेलिया की न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी से जुड़ी विशेषज्ञ सराह पर्किन्स-किलपैट्रिक ने अखबार द गार्जियन से कहा कि आखिरकार जलवायु परिवर्तन के असर औसत परिवर्तनों के बजाय अत्यधिक परिवर्तनों के रूप में जाहिर होंगे। अनेक दूसरे जानकार भी इस बात से सहमत हैं कि अब ऐसे ही परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं।
जलवायु विशेषज्ञों के मुताबिक उन्नीसवीं के उत्तरार्द्ध की तुलना में अब तक धरती का औसत तापमान 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। इनमें से ज्यादातर तापमान वृद्धि पिछले 50 वर्षों के दौरान हुई है। जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए हुई पेरिस संधि में साल 2100 तक इस वृद्धि को दो डिग्री से कम रखने का संकल्प जताया गया था। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु संबंधी सलाहकार समिति- आईपीसीसी के मुताबिक अगर तापमान वृद्धि को साल 2100 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस तक ही सीमित रखा जाए, तभी धरती सुरक्षित रह पाएगी।