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Uttarkashi News: रवांई घाटी में बैलों की जगह मशीनों से हो रही लाल धान की मंडाई
Sat, 17 Oct 2026 04:47 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, उत्तर काशी
संवाद न्यूज एजेंसी, उत्तर काशी
Updated Sat, 17 Oct 2026 04:47 PM IST
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पुरोला। रवांई घाटी में पारंपरिक लाल धान की मंडाई का काम इन दिनों जोरों पर है। कभी बैलों की मदद से कई दिनों में पूरी होने वाली मंडाई अब थ्रेशर मशीनों से कुछ ही घंटों में हो रही है। खेती में आए इस बदलाव से जहां किसानों का समय और मेहनत बच रही है वहीं पुरानी परंपराओं को लेकर बुजुर्ग किसानों की चिंता भी सामने आ रही है।
युवा किसान महिदेव असवाल, अर्जुन सिंह और उपेंद्र रावत का कहना है कि मशीनों से मजदूरों पर निर्भरता कम हुई है और मेहनत भी बच रही है। हालांकि, पहाड़ के खेतों तक बड़ी मशीनें पहुंचाना आसान नहीं है। वहीं, बुजुर्ग किसान युद्धबीर सिंह, हरी सिंह और सुदामा प्रसाद का कहना है कि पहले लाल धान की मंडाई से पहले फसल को कुनका लगाकर करीब एक महीने तक रखा जाता था। इससे धान के दाने मोटे और मजबूत होते थे और उनकी पौष्टिकता भी बेहतर रहती थी। रवांई घाटी में खेती अब तेजी से बदल रही है। ऐसे में पहाड़ के अनुकूल मशीनें उपलब्ध कराने के साथ पारंपरिक खेती के उपयोगी तरीकों को भी सहेजना जरूरी है। संवाद
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युवा किसान महिदेव असवाल, अर्जुन सिंह और उपेंद्र रावत का कहना है कि मशीनों से मजदूरों पर निर्भरता कम हुई है और मेहनत भी बच रही है। हालांकि, पहाड़ के खेतों तक बड़ी मशीनें पहुंचाना आसान नहीं है। वहीं, बुजुर्ग किसान युद्धबीर सिंह, हरी सिंह और सुदामा प्रसाद का कहना है कि पहले लाल धान की मंडाई से पहले फसल को कुनका लगाकर करीब एक महीने तक रखा जाता था। इससे धान के दाने मोटे और मजबूत होते थे और उनकी पौष्टिकता भी बेहतर रहती थी। रवांई घाटी में खेती अब तेजी से बदल रही है। ऐसे में पहाड़ के अनुकूल मशीनें उपलब्ध कराने के साथ पारंपरिक खेती के उपयोगी तरीकों को भी सहेजना जरूरी है। संवाद
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