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मौसम की मार के बाद अब सेब की फसल पर टूटा जंगली जानवरों का कहर
Updated Sun, 22 Jul 2018 10:16 PM IST
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उत्तरकाशी। मौसम चक्र में आ रहे बदलावों की मार झेलने के बाद अब सेब की फसल पर जंगली जानवरों का आतंक मंडराने लगा है। उपला टकनौर क्षेत्र में विकसित हो रहे सेब के फलों को भालू, तोते, लंगूर नष्ट कर रहे हैं, जिससे पहले ही कम पैदावार की समस्या से जूझ रहे सेब काश्तकारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
बता दें कि उपला टकनौर के हर्षिल, धराली, सुक्की आदि स्थानों में बीते वर्ष अप्रैल-मई में हुई ओलावृष्टि के कारण सेब की फसल को करीब 80 प्रतिशत का नुकसान हुआ था। वहीं इस वर्ष भी जनवरी-फरवरी में नहीं के बराबर बर्फबारी होने से अच्छी फसल के लिए जरूरी न्यूनतम अवशीतन तापमान नहीं मिल पाया। फ्लावरिंग सीजन के दौरान हुई ओलावृष्टि एवं मई-जून में अचानक हुई बर्फबारी के कारण परागन प्रक्रिया भी बाधित हुई। इससे सेब की पैदावार करीब 60 प्रतिशत तक ही सिमट गई है। इन सारी आपदाओं को झेलने के बाद बची फसल पर ही काश्तकारों की उम्मीद टिकी है, लेकिन अब भालू, तोते, लंगूर फलों को नष्ट कर रहे हैं। सेब काश्तकार मोहन राणा, प्रताप सिंह, धर्मचंद ने बताया कि तोतों को भगाने के लिए काश्तकार सुबह से शाम तक बगीचों में चौकीदारी कर रहे हैं। काश्तकार लंबे समय से जंगली जीवों से बगीचों को बचाने की मांग कर रहे, लेकिन वन विभाग इस पर ध्यान नहीं दे रहा है।
कोट:
जंगली सुअर आदि छोटे जीवों को कृषि भूमि एवं बागीचों से दूर रखने के लिए तारबाड़ एवं सुरक्षा दीवार निर्माण किया जा सकता है, लेकिन भालू के लिए फिलहाल कोई योजना नहीं है। मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति पर परेशान करने वाले जीव को पकड़ कर दूर करा जा सकता है।
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- संदीप कुमार, डीएफओ उत्तरकाशी वन प्रभाग।
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बता दें कि उपला टकनौर के हर्षिल, धराली, सुक्की आदि स्थानों में बीते वर्ष अप्रैल-मई में हुई ओलावृष्टि के कारण सेब की फसल को करीब 80 प्रतिशत का नुकसान हुआ था। वहीं इस वर्ष भी जनवरी-फरवरी में नहीं के बराबर बर्फबारी होने से अच्छी फसल के लिए जरूरी न्यूनतम अवशीतन तापमान नहीं मिल पाया। फ्लावरिंग सीजन के दौरान हुई ओलावृष्टि एवं मई-जून में अचानक हुई बर्फबारी के कारण परागन प्रक्रिया भी बाधित हुई। इससे सेब की पैदावार करीब 60 प्रतिशत तक ही सिमट गई है। इन सारी आपदाओं को झेलने के बाद बची फसल पर ही काश्तकारों की उम्मीद टिकी है, लेकिन अब भालू, तोते, लंगूर फलों को नष्ट कर रहे हैं। सेब काश्तकार मोहन राणा, प्रताप सिंह, धर्मचंद ने बताया कि तोतों को भगाने के लिए काश्तकार सुबह से शाम तक बगीचों में चौकीदारी कर रहे हैं। काश्तकार लंबे समय से जंगली जीवों से बगीचों को बचाने की मांग कर रहे, लेकिन वन विभाग इस पर ध्यान नहीं दे रहा है।
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कोट:
जंगली सुअर आदि छोटे जीवों को कृषि भूमि एवं बागीचों से दूर रखने के लिए तारबाड़ एवं सुरक्षा दीवार निर्माण किया जा सकता है, लेकिन भालू के लिए फिलहाल कोई योजना नहीं है। मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति पर परेशान करने वाले जीव को पकड़ कर दूर करा जा सकता है।
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- संदीप कुमार, डीएफओ उत्तरकाशी वन प्रभाग।