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नंदादेवी बायोस्फियर रिजर्व में बढ़ रहे वन
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डॉ. बलवंत रावत।
- फोटो : RUDRAPUR
पंतनगर। ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी देहरादून के प्रो. डॉ. बलवंत रावत ने वर्ष 1990 में इंडियन जर्नल में प्रकाशित पीएचडी शोध को केंद्र में रखकर राज्य के एक मात्र बायोस्फियर रिजर्व नंदा देवी (एनडीबीआर) पर शोध किया है। इसमें एनडीबीआर के मुख्य 30 वनों पर शोध कर पिछले 25 वर्षों में वनों में हुए बदलाव पर कार्य किया। फिर उसी प्रक्रिया को समान रूप से दोहराकर (रीइन्वेस्टिगेशन में) पाया कि कुछ वनों को छोड़कर बाकी सारे वन समान या बेहतर रूप से विकसित हो रहे हैं।
प्रो. रावत ने बताया कि ऐतिहासिक वनस्पतियों का सर्वेक्षण होना चाहिए। इससे स्थायी रूप से चिह्नित न हो सकी वनस्पति की संरचना और समय के साथ इसमें हो रहे बदलावों के बारे में हमारी समझ को बढ़ा सकता है। हिमालय के दूरदराज के वनों से जुड़े इस प्रकार के शोध बहुत कम उपलब्ध हैं। हालांकि वनों के संरक्षण के लिए कई संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना की जा चुकी है, ऐसे भी कई संरक्षित क्षेत्र हैं, जहां पर वनों के साथ विलुप्त होती जीव-जंतुओं की प्रजातियों का संरक्षण मुख्य मुद्दा होता है।
एक नए शोध में पता चला है कि संरक्षित क्षेत्रों में वनों की संख्या भी बढ़ रही है। उन्होंने अपने शोध में वनों में हो रहे सकारात्मक, नकारात्मक बदलावों को जानने के लिए मानवजनित, प्राकृतिक बाधाओं समेत स्थानिक, देसी एवं विदेशी पादप प्रजातियों के प्रभावों पर भी शोध कार्य किया। सारे आयामों पर शोध का निष्कर्ष निकला कि संरक्षण की बेहतर कार्यप्रणालियों के कारण एनडीबीआर में वन प्रभावशाली रूप में विकसित हो रहे हैं। संवाद
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सुदूर वनों में हो रहे बदलावों की देता है जानकारी
पंतनगर। प्रो. रावत ने बताया कि पहले से (वर्ष 1990) प्रभुत्व वाली प्रमुख वृक्ष प्रजातियां जैसे अलनस नेपलेंसिस (एल्डर), एसर कप्पाडोसिकम (मेपल), क्वार्कस फ्लोरिबंडा (मोरु ओक), क्वार्कस सेमिकार्पिफोलिया (ब्राउन ओक), हिप्पोफा सैलिसिफोलिया (सीबकथॉर्न), बेटुला यूटिलिस (हिमालयन बर्च) अध्ययन में शामिल 11 पादप समुदायों में से नौ में आज भी प्रभुत्व दिखा रहीं हैं।
उनका यह शोध एनवायर्नमेंटल मॉनिटरिंग एंड एसेसमेंट जर्नल में प्रकाशित हुआ है। उन्होंने यह शोध कार्य प्रो. रणबीर सिंह रावल व प्रो. ललित तिवारी के मार्गदर्शन में जीबी पंत पर्यावरण संस्थान कोसी-कटारमल अल्मोड़ा में किया है। यह शोध न केवल सुदूर वनों में समय के साथ हो रहे बदलावों की जानकारी देता है बल्कि वनों के संरक्षण के लिए संरक्षित क्षेत्रों की भागीदारी भी बताता है। इससे वनों पर भविष्य में व्यापक रूप से सर्वेक्षण का मार्ग खुलेगा। संवाद
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प्रो. रावत ने बताया कि ऐतिहासिक वनस्पतियों का सर्वेक्षण होना चाहिए। इससे स्थायी रूप से चिह्नित न हो सकी वनस्पति की संरचना और समय के साथ इसमें हो रहे बदलावों के बारे में हमारी समझ को बढ़ा सकता है। हिमालय के दूरदराज के वनों से जुड़े इस प्रकार के शोध बहुत कम उपलब्ध हैं। हालांकि वनों के संरक्षण के लिए कई संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना की जा चुकी है, ऐसे भी कई संरक्षित क्षेत्र हैं, जहां पर वनों के साथ विलुप्त होती जीव-जंतुओं की प्रजातियों का संरक्षण मुख्य मुद्दा होता है।
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एक नए शोध में पता चला है कि संरक्षित क्षेत्रों में वनों की संख्या भी बढ़ रही है। उन्होंने अपने शोध में वनों में हो रहे सकारात्मक, नकारात्मक बदलावों को जानने के लिए मानवजनित, प्राकृतिक बाधाओं समेत स्थानिक, देसी एवं विदेशी पादप प्रजातियों के प्रभावों पर भी शोध कार्य किया। सारे आयामों पर शोध का निष्कर्ष निकला कि संरक्षण की बेहतर कार्यप्रणालियों के कारण एनडीबीआर में वन प्रभावशाली रूप में विकसित हो रहे हैं। संवाद
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सुदूर वनों में हो रहे बदलावों की देता है जानकारी
पंतनगर। प्रो. रावत ने बताया कि पहले से (वर्ष 1990) प्रभुत्व वाली प्रमुख वृक्ष प्रजातियां जैसे अलनस नेपलेंसिस (एल्डर), एसर कप्पाडोसिकम (मेपल), क्वार्कस फ्लोरिबंडा (मोरु ओक), क्वार्कस सेमिकार्पिफोलिया (ब्राउन ओक), हिप्पोफा सैलिसिफोलिया (सीबकथॉर्न), बेटुला यूटिलिस (हिमालयन बर्च) अध्ययन में शामिल 11 पादप समुदायों में से नौ में आज भी प्रभुत्व दिखा रहीं हैं।
उनका यह शोध एनवायर्नमेंटल मॉनिटरिंग एंड एसेसमेंट जर्नल में प्रकाशित हुआ है। उन्होंने यह शोध कार्य प्रो. रणबीर सिंह रावल व प्रो. ललित तिवारी के मार्गदर्शन में जीबी पंत पर्यावरण संस्थान कोसी-कटारमल अल्मोड़ा में किया है। यह शोध न केवल सुदूर वनों में समय के साथ हो रहे बदलावों की जानकारी देता है बल्कि वनों के संरक्षण के लिए संरक्षित क्षेत्रों की भागीदारी भी बताता है। इससे वनों पर भविष्य में व्यापक रूप से सर्वेक्षण का मार्ग खुलेगा। संवाद