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मुख्तयार हत्याकांड में जसपुर की पूर्व पालिकाध्यक्ष फरीदा बेगम सहित दो की उम्रकैद की सजा बरकरार
Tue, 18 Dec 2018 12:03 AM IST
अरुण कुमार
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो
Published by: अरुण कुमार
Updated Tue, 18 Dec 2018 12:03 AM IST
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मृतक पूर्व पालिकाध्यक्ष मुख्तयार का फाइल फोटो।
- फोटो : amar ujala
जसपुर के पूर्व पालिकाध्यक्ष हाजी मुख्तयार अहमद हत्याकांड में जसपुर की पूर्व पालिकाध्यक्ष फरीदा बेगम और सह आरोपी मोहम्मद अशरफ को उत्तराखंड हाईकोर्ट और एडीजे कोर्ट से मिली आजीवन कारावास की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है। कोर्ट ने मुख्तयार हत्याकांड में चार अन्य को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। 72 वर्षीय फरीदा बेगम को 18 दिसंबर तक काशीपुर कोर्ट में आत्मसमर्पण करना है। अत : वह मंगलवार को सरेंडर कर सकती हैं। फरीदा बेगम सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अभी जमानत पर हैं। अदालत ने चार दिसंबर 2018 को फैसला सुनाया था।
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जसपुर निवासी और 1988 में नगर पालिकाध्यक्ष रहे हाजी मुख्तयार अहमद की एक जुलाई 1999 को रात करीब साढ़े आठ बजे रफीक अहमद (दिलदार) के घर पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। शाहिद हुसैन ने जसपुर कोतवाली में तत्कालीन पालिकाध्यक्ष फरीदा बेगम, मोहम्मद अशरफ, रईस अहमद उर्फ सतना, रईस उर्फ लपट्टी, असलम, नसीम उर्फ चुरती, इदरीश उर्फ मिर्ची के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
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इस मामले की मुख्य अभियुक्त तत्कालीन पालिकाध्यक्ष फरीदा बेगम सहित अन्य कुछ आरोपियों को पहले एडीजे कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस सजा को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था। 2013 में अभियुक्तों ने सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अपील (याचिका संख्या 1560/2013) दायर की। कोर्ट ने कहा है कि फरीदा बेगम जमानत पर है, अत: आदेश के दो सप्ताह के भीतर वह संबंधित न्यायालय में आत्मसमर्पण करें। मोहम्मद अशरफ जेल में है। इस याचिका की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बैंच न्यायमूर्ति एमआर शाह, न्यायमूर्ति एन वी रामाना व न्यायमूर्ति मोहन एम. संतनागोदर ने की।
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ये बनी घटना की वजह
काशीपुर। वर्ष 1997 में फरीदा बेगम जसपुर नगर पालिका की चेयरमैन चुनी गईं थीं। मुख्तयार अहमद वर्ष 1988 में चेयरमैन थे। फरीदा को शक था कि पूर्व चेयरमैन मुख्तयार उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए सभासदों को उकसा रहा है।
एडीजे कोर्ट ने 2004 और हाईकोर्ट ने 2012 में सुनाई थी सजा
काशीपुर। मामले की विवेचना तत्कालीन थानाध्यक्ष डीके शर्मा ने की थी। अभियोगपत्र दायर होने पर मुकदमे की सुनवाई अतिरिक्त जिला न्यायाधीश की अदालत में हुई। सुनवाई के दौरान हत्या के एक आरोपी असलम की हत्या कर दी गई। सुनवाई के दौरान वाद के समर्थन में वादी शहिद, रफी, नईम खान, मो. नवी के अलावा विवेचना अधिकारी डीके शर्मा व उपनिरीक्षक निर्विकार आदि को परीक्षित कराया गया। दोनों पक्षों को सुनने के बाद 23 जुलाई 2004 को एडीजे कोर्ट ने छह आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। निचली अदालत के इस आदेश के खिलाफ आरोपियों ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में अपील की। हाईकोर्ट ने 22 अगस्त 2012 को निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा।
सभासद असलम की हत्या में भी हुए थे पांच नामजद
काशीपुर। पूर्व पालिकाध्यक्ष मुख्तयार की हत्या के चार साल बाद ही इस मामले के एक आरोपी असलम की भी हत्या कर दी गई। जसपुर नईबस्ती निवासी पूर्व सभासद असलम पुत्र उस्मान काशीपुरिया को भी मुख्तयार हत्याकांड में नामजद किया गया था। दिसंबर 2003 में असलम की भी हत्या कर दी गई। इस मामले में शाहिद उर्फ लवली, रईस उर्फ सतना, रफिया, नईम खान व गुलाम नेता को नामजद किया गया था। इस मामले में भी निचली अदालत ने पांचों आरोपियों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। उच्च न्यायालय में अपील किए जाने पर तीन आरोपियों शाहिद उर्फ लवली, रईस उर्फ सतना और गुलाम नेता की सजा को हाईकोर्ट ने बरकरार रखा। ये तीनों अभी जेल में है। असलम हत्याकांड के दो अन्य आरोपी नईम खान 1द्मस्द्भ रफिया उच्च न्यायालय में की गई अपील पर छूट गए थे।