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आश्रम में हो रही अथर्ववेद की नयी पीढ़ी तैयार
ब्यूरो/अमर उजाला,ऋषिकेश
Updated Thu, 10 Mar 2016 01:38 AM IST
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अथ्ार्ववेद
- फोटो : amar ujala
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ज्ञान का मूल स्रोत वेद की अधिकांश शाखाएं लुप्तप्राय स्थिति में हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद वेद। इन चारों वेदों की कुल 11 सौ से अधिक शाखाओं में से वर्तमान में चारों वेदों की कुल 12 से 13 शाखाओं की मूल लिपि उपलब्ध बताई जाती है। इन्हीं का पठन-पाठन भी वर्तमान में हो पा रहा है।
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काबिलेगौर है कि वेद की जन्मस्थली उत्तराखंड के संस्कृत विद्यालयों में यजुर्वेद की दो शाखाओं में से एक शुक्ल यजुर्वेद का पठन-पाठन ही हो पा रहा है।
मगर तीर्थनगरी में एक धार्मिक संस्था ने यहां अथर्ववेद की शौनक शाखा का प्राथमिक स्तर पर पठन पाठन शुरू किया है। मुनिकीरेती के शीशमझाड़ी स्थित स्वामी नारायण आश्रम वैदिक ऋषिकुल में 10 से 14 वर्ष के बच्चों को अथर्ववेद का सस्वर अक्षुण्ण परंपरा का अध्ययन कराया जा रहा है। इसका मूल उद्देश्य वेदों की विलुप्त होती शाखाओं को बचाना और नई पीढ़ी को प्राच्य विद्या की परंपरा से जोड़कर संस्कारवान बनाना है।
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आश्रम के परमाध्यक्ष हरिप्रकाश शास्त्री और संचालक सुनील भगत ने बताया कि उत्तराखंड में अथर्ववेद की पहली और दुर्लभ शाखा का पठन-पाठन प्रारंभ करने में उन्हें कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा। लिहाजा कई लोगों से संपर्क और सहायता लेने के बाद बनारस (काशी) से अथर्ववेद के आचार्य को वेद शाखा के अध्यापन के लिए बुलाना पड़ा।
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अथर्वदेव की शौनक शाखा की विशेषताएं
यह वेद मानव जीवन के सर्वाधिक निकट है। इसमें जल चिकित्सा, नक्षत्र विज्ञान, अनेक प्रकार के रोगों का शमन, बुद्धि विकसित करने के उपाय (मेधा जनन), कृषि विज्ञान, लोक व्यवहार, राजनीति, तंत्र क्रिया, व्यापार आदि विषयों के सूत्र मौजूद हैं, जो सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अत्यधिक लाभकारी हैं। वेदों के जानकार डा. नारायण प्रसाद भट्टराई का मानना है कि ऋषिकुल में पढ़ रहे उत्तराखंड, आसाम, उप्र. हिमाचल आदि प्रांतों के बच्चे इस विषय के अध्ययन के बाद राज्य ही नहीं विभिन्न प्रांतों में लोगों को समाजोपयोगी वैदिक ज्ञान से लाभान्वित करेंगे ।
बच्चे बोले, अब सरल लगने लगा वेद अध्ययन
स्वामी नारायण आश्रम वैदिक ऋषिकुल में अध्ययनरत चंपावत के छात्र गौरव उपाध्याय, आसाम के वीरेंद्र पोखरेल, बरेली उप्र. के वंशित शर्मा, लखीमपुर खीरी उत्तरप्रदेश के जनार्दन मिश्रा और अनुराग मिश्रा का कहना है कि अथर्ववेद के अध्ययन के प्रारंभिक दिनों में उच्चारण को लेकर काफी कठिनाई आई। मगर अभ्यास के बाद इसे पढ़ना सरल लग रहा है।