साहित्य समाज के मध्य से ही जन्म लेता है। समाज मे व्याप्त धर्म दर्शन और राष्ट्रीयता की भावना ही साहित्य की परंपरा को बलवती बनाती है। यह बात हमारी साहित्य परम्परा विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य वक्ता देवेंद्र दत्त सकलानी ने कही। बृहस्पतिवार को अखिल भारतीय साहित्य परिषद ऋषिकेश की ओर से रायवाला स्थित एक रिजॉर्ट में ‘हमारी साहित्य परम्परा’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहन सिंह रावत ग्रामवासी, प्रो. बलवंत जानी, डा. हरीश धींगरा, अरुणा वशिष्ठ, डा. धीरेंद्र रांगड़, अनिल शर्मा, पूर्व उच्च शिक्षा निदेशक डा. सविता मोहन ने संयुक्त रुप से किया।
मुख्य वक्ता देवेंद्र दत्त सकलानी ने कहा कि साहित्य समाज को दिशा देने का काम करता है। साहित्य नहीं होगा तो समाज को सही दिशा नहीं मिल सकेगी। उन्होंने कहा कि साहित्यकार सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने साहित्य साधना का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है। शैलेश मटियानी ने साहित्य परम्परा के कई जीवंत उदाहरण पेश किए हैं। साथ ही राष्ट्रवाद को स्थापित करने का काम किया किया है। इस मौके पर प्रो. कल्पना पंत, सुनील पाठक, वयोवृद्ध साहित्यकार योगेंद्र शर्मा अरुण डीडी काला आदि ने भी विचार रखे। प्रांतीय अध्यक्ष अनिल शर्मा व प्रांतीय महासचिव डा. धीरेंद्र रांगड़ ने बताया कि परिषद साहित्य के क्षेत्र में भारतीय साहित्य को स्थापित करने व देश के वातावरण को स्वस्थ बनाए रखने के लिए समस्त भारतीय भाषाओं एवं उनके साहित्य का संरक्षण करने तथा नवोदय साहित्यकारों को प्रोत्साहित देने वाली संस्था है। इसके अलावा मदर मैरीकल स्कूल के बच्चों ने मनमोहक और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। कार्यक्रम का संचालन नगर अध्यक्ष शिव प्रसाद बहुगुणा व मनोज कुमार गुप्ता ने किया। इस अवसर पर गजेंद्र कंडियाल, हुकुम सिंह रावत, ओमप्रकाश बडोनी, ऊषा भंडारी, सुषमा रांगड़, पूनम गुप्ता, वीना गुसाईं, अनिरुद्ध गुप्ता आदि उपस्थित रहे।