अब राहत ही बन रही ‘आफत’

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सुधाकर भट्ट Published by: Updated Wed, 10 Jul 2013 08:05 AM IST
relief becomes problem

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सरकारी तंत्र तात्कालिक राहत के नाम पर आंकड़ों के खेल में उलझा है। सरकार की मानें तो करीब 897 क्विटंल खाद्य सामग्री का वितरण सोमवार तक किया जा चुका है।
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मोटा अनुमान लगाया जाए तो सरकार पांच हजार परिवारों को एक माह का राशन उपलब्ध करा चुकी है। दूसरी तरफ एनजीओ और अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ ही सियासी दलों के पास भी प्रभावितों को राहत पहुंचने के अपने दावे हैं। इसके बाद भी आपदा प्रभावित क्षेत्रों से राहत न मिलने का शोर लगातार उठ रहा है।


नए सिरे से समझने की जरूरत
जाहिर है कि राहत केनाम पर सामने आ रही आफत इस बात का इशारा कर रही है कि पूरी प्रक्रिया को नए सिरे से समझने की जरूरत है। सरकारी दावा है कित अकेले देहरादून सेंटर से ही राहत सामग्री के 550 से अधिक ट्रक भेजे जा चुके हैं। इसके अलावा जिला मुख्यालयों से भी रसद और अन्य सामग्री की लगातार सप्लाई की जा रही है।

गैर सरकारी और स्वयं सेवी संस्थाओं की ओर से किया गया योगदान का तो फिलहाल अंदाजा ही है। आपदा से मुख्य रूप से उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग और पिथौरागढ़ जिले ही मुख्य तौर पर प्रभावित हैं। अब तक भेजी गई राहत सामग्री को विशेषज्ञ इन चार जिलों के लिए पर्याप्त भी बता रहे हैं।

इसके बाद भी पर मांग है कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है। जाहिर है कि राहत के इस काम में कहीं न कहीं झोल है। इसी के चलते अब राहत पर सवाल भी उठ रहे हैं।

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पहला सवाल तो राहत की गुणवत्ता का ही है। शुरुआती दौर में राहत सामग्री के नाम पर फूड पैकेट उपलब्ध कराए गए। अधिकतर स्थानों पर एयर ड्रापिंग हुई और सामग्री का अधिकतर हिस्सा लोगों के काम नहीं आ सका।

गुप्तकाशी क्षेत्र के कोटमा गांव के लोगों के मुताबिक राहत सामग्री जहां गिरी वहां से निकालने का मतलब जान जोखिम में डालने था। दस दिन बीतने केबाद सामग्री को अधिक योजनाबद्ध तरीके से बांटने का काम शुरू हुआ।

सामग्री पहुंचाना टेढ़ी खीर
अब बंदरबांट, जमाखोरी, कालाबाजारी और दुर्गम इलाकों की कोई पूछ न होने के आरोप उभर रहे हैं। संपर्क मार्ग न खुलने से कई स्थानों पर राहत सामग्री पहुंचाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। राहत सामग्री वास्तविक जरूरत वाले क्षेत्रों तक न पहुंच पाने की शिकायत आम हो रही है।

शासन और प्रशासन का आपदा प्रभावितों के साथ कोई सीधा संपर्कभी नहीं है। बीच में कई स्तर पर अन्य लोग भी सक्रिय हैं।

इससे राहत का सही हाथों तक पहुंचना संभव नहीं हो पा रहा है। अब कहा जा रहा है कि अगर अंतिम छोर पर गांव में ही प्रभावशाली तबका बेईमानी पर उतर आए तो किया भी क्या जाए।

इस सारी आपाधापी से जाहिर है कि राहत प्रक्रिया को भी फिर से देखे जाने की जरूरत है। राहत कार्य से जुडे़ गजेंद्र रौतेला के मुताबिक पर्वतीय जिलों में न्याय पंचायत स्तर पर राहत का सामान उपलब्ध होना चाहिए। न्याय पंचायत स्तर पर यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किस तरह की राहत सामग्री की जरूरत होगी।

इसका भंडारण आपदा से पहले होना चाहिए और आपदा के बाद वितरण इस तरह से हो कि मूवमेंट कम से कम हो। वर्तमान प्रणाली पूरी तरह से केंद्रीकृत है। शासन स्तर पर मांग का अनुमान लगाया जा रहा है और उसी आधार पर सामग्री भेजी जा रही है।

हो रही जमाखोरी

जमाखोरी को जानने के लिए अलग से पड़ताल की जरूरत नहीं है। रुद्रप्रयाग जिले में राहत सामग्री का एक केंद्र गुप्तकाशी भी है। यही कस्बा आस-पास के गांवों का मुख्य बाजार भी है। इस बार मुख्य बाजारों से लोगों का संपर्क कट गया है।

अब शिकायत यह भी मिल रही है कि आसपास के गांवों के नाम पर इन गांवों का प्रभावशाली तबका गुप्तकाशी में ही राहत सामग्री को स्टोर कर रहा है।

गैर सरकारी मदद का हिसाब नहीं
कई गैर सरकारी संगठन भी राहत सामग्री को बांटने में जुटे हैं। ऐसे में इस सामग्री का पूरा उपयोग किस तरह से हो रहा है यह भी कोई पूछने वाला नही है। हाल यह है कि कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता धीरेंद्र प्रताप खुद कांग्रेस की ओर से 200 ट्रक राहत सामग्री भेजने का दावा कर रहे हैं।

इसमें से 29 ट्रक एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस की ओर से बांटे जाने की बात की जा रही है। भाजपा भी इसमें सक्रिय है। एक कांग्रेसी नेता के मुताबिक पार्टी विशेष की राहत सामग्री को पार्टी लाइन पर ही बांटा जा रहा है।

कुछ ऐसे भी बंट रही राहत
रुद्रप्रयाग से कुछ पहले मलबा आने से हमारी गाड़ी भी रुकी हुई थी। अचानक एक आदमी आया और गाड़ी में बिस्किट, पानी की बोतल, कुछ खाने का सामान डाल कर चलता बना। पूछने पर पता चला कि राहत सामग्री लेकर जनाब दून से आए थे। सड़क बंद हो गई तो वहीं पर सामान बांट कर चलते बने।
-हरीश रावत, केंद्रीय जल संसाधन मंत्री

पानी की बोतल और कपड़ों का अंबार
कुछ समय तक मीडिया में यह खबर भी उछली कि कई पेयजल योजनाएं ध्वस्त होने कारण पीने का पानी भी लोगों को नहीं मिल पा रहा है। लिहाजा बोतलबंद पानी की बाढ़ भी राहत सामग्री में आ गई। श्रीनगर में ही गोदामों में ऐसी बोतलों का ढेर लगा है। दिल्ली और अन्य स्थानों की इन संस्थाओं को यह बताने वाला कोई नहीं है कि लोगों की वास्तविक जरूरत आखिर है क्या।

पुनर्वास की जरूरत ज्यादा
इस बार एक सौ से ज्यादा गांव आपदा प्रभावित हैं। इनके साथ ही पहले से चिह्नि 233 गांव और हैं। ये गांव भूमि धंसाव के कारण हर मानसून में रात भर जागते हैं। हर बरसात इन गांवों पर भारी पड़ती है। इन्हें राहत की कम और पुनर्वास की जरूरत ज्यादा है। तात्कालिक राहत की आपाधापी में इन गांवों की जरूरत की हर बार अनदेखी हो जाती है।

इनमें से 88 गांवों का ही सर्वे हो पाया है। बाकी के गांव सर्वे का इंतजार कर रहे हैं। टिहरी में बांधों के प्रभाव को लेकर सामाजिक रूप से सक्रिय त्रेपन सिंह चौहान के मुताबिक परेशानी को सही तरीके से नहीं समझा जा रहा है। इनका विस्थापन ऐसी जगह हो जहां से ये ग्रामीण जल, जंगल और जमीन से दूर न हों। टिहरी बांध विस्थापितों की तरह ही इन गांवों को भी मैदानी जिलों में विस्थापित करने की कोशिश की गई तो समस्या जस की तस रहेगी।

अब तक वितरित की गई राहत सामग्री
खाद्य सामग्री-897 क्विंटल
मिट्टी का तेल-32 हजार लीटर
गैस सिलेंडर-614
पशु आहार-650 किलो
मुआवजा-7.77 करोड़

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