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आपदा से बेघर हुए लोगों की कब ली जाएगी सुध
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पिथौरागढ़। पिथौरागढ़ जिले में एक सौ से अधिक गांवों के सैकड़ों लोग आपदा के कारण खतरे में रहे रहे हैं। मुनस्यारी और धारचूला विकासखंडों में सबसे अधिक गांव खतरे में हैं। लंबे समय से इन गांवों के पुनर्वास की मांग उठ रही है, लेकिन अभी तक एक भी गांव का पुनर्वास नहीं किया गया है।
पिथौरागढ़ जनपद का मुनस्यारी और धारचूला क्षेत्र आपदा की दृष्टि से सबसे अधिक संवेदनशील है। वर्तमान में जनपद के लगभग सौ गांव आपदा के कारण खतरे की जद में हैं। बरसात शुरू होते ही इन गांवों में रहना जान जोखिम में डालने जैसा होता है। जमीन दरकने से मुनस्यारी का क्वीरी और जीमिया गांव पूरी तरह से तबाह हो चुके हैं। चार वर्ष पूर्व नदी ने मदकोट का भूगोल बदल दिया था। जमीन दरकने से दो दर्जन से अधिक मकान नदी में समा गए थे।
गोरी पार क्षेत्र के कई गांवों में आपदा के कारण वर्षाकाल में मकान खतरे की जद में आ जाते हैं। यही हाल धारचूला तहसील क्षेत्र में भी है। डेढ़ दशक पूर्व यहां के सुवा और सोबला गांव बह गए थे। इसके बाद जिस स्थान पर नया सोबला गांव बसाया गया वह भी आपदा ने लील लिया। काली नदी धारचूला से लेकर झूलाघाट तक के दर्जनों मकानों को लील चुकी है।
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धारचूला का झिमिर गांव और बरम क्षेत्र के नदी किनारे बसे कई गांव भूस्खलन के कारण खतरे में है। जमीन दरकने से हुए मालपा, ला झेकला, बरम, बस्तड़ी के बड़े हादसे आज भी सिहरन पैदा कर देते हैं। हर साल बरसात के मौसम में बढ़ रहे खतरे को देखते हुए आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से इन गांवों के आपदा प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने के लिए प्रस्ताव शासन को भेजा था। अभी तक प्रशासन नए स्थलों का चयन नहीं कर पाया है।
पुनर्वास की आस छोड़कर आज अच्छी आर्थिक स्थिति वाले परिवार शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। जो गरीब और किसान इन गांवों में रह रहे हैं उन्हें बरसात के समय सरकारी भवनों या टैंटों में रखा जाता है। नेताओं के साथ ही अधिकारियों की ओर से भी आपदा प्रभावितों की समस्याओं के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन जैसे ही बरसात का मौसम गुजरता है यह परिवार फिर से मौत का मुहाना बने इन्हीं घरों में लौटने को मजबूर हो जाते हैं। इस बार चुनावों में आपदा प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्वास के मुद्दे पर भी सियासी दलों के नेताओं को जवाब देना पड़ सकता है।
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पिथौरागढ़ जनपद का मुनस्यारी और धारचूला क्षेत्र आपदा की दृष्टि से सबसे अधिक संवेदनशील है। वर्तमान में जनपद के लगभग सौ गांव आपदा के कारण खतरे की जद में हैं। बरसात शुरू होते ही इन गांवों में रहना जान जोखिम में डालने जैसा होता है। जमीन दरकने से मुनस्यारी का क्वीरी और जीमिया गांव पूरी तरह से तबाह हो चुके हैं। चार वर्ष पूर्व नदी ने मदकोट का भूगोल बदल दिया था। जमीन दरकने से दो दर्जन से अधिक मकान नदी में समा गए थे।
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गोरी पार क्षेत्र के कई गांवों में आपदा के कारण वर्षाकाल में मकान खतरे की जद में आ जाते हैं। यही हाल धारचूला तहसील क्षेत्र में भी है। डेढ़ दशक पूर्व यहां के सुवा और सोबला गांव बह गए थे। इसके बाद जिस स्थान पर नया सोबला गांव बसाया गया वह भी आपदा ने लील लिया। काली नदी धारचूला से लेकर झूलाघाट तक के दर्जनों मकानों को लील चुकी है।
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धारचूला का झिमिर गांव और बरम क्षेत्र के नदी किनारे बसे कई गांव भूस्खलन के कारण खतरे में है। जमीन दरकने से हुए मालपा, ला झेकला, बरम, बस्तड़ी के बड़े हादसे आज भी सिहरन पैदा कर देते हैं। हर साल बरसात के मौसम में बढ़ रहे खतरे को देखते हुए आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से इन गांवों के आपदा प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने के लिए प्रस्ताव शासन को भेजा था। अभी तक प्रशासन नए स्थलों का चयन नहीं कर पाया है।
पुनर्वास की आस छोड़कर आज अच्छी आर्थिक स्थिति वाले परिवार शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। जो गरीब और किसान इन गांवों में रह रहे हैं उन्हें बरसात के समय सरकारी भवनों या टैंटों में रखा जाता है। नेताओं के साथ ही अधिकारियों की ओर से भी आपदा प्रभावितों की समस्याओं के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन जैसे ही बरसात का मौसम गुजरता है यह परिवार फिर से मौत का मुहाना बने इन्हीं घरों में लौटने को मजबूर हो जाते हैं। इस बार चुनावों में आपदा प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्वास के मुद्दे पर भी सियासी दलों के नेताओं को जवाब देना पड़ सकता है।