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इस बार सभी जगह शानदार ढंग से उग गया हरेला
Updated Sat, 15 Jul 2017 10:43 PM IST
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पिथौरागढ़। कहते हैं कि यदि हरेला सही ढंग से उग जाए तो उस साल फसलें अच्छी होती हैं और यह सुख, संपन्नता का संकेत होता है। इस बार घरों, मंदिरों में बोया गया हरेला शानदार तरीके से उगा है। रविवार को सुबह सभी घरों में हरेले के तिनकों से सिर पूजन होगा। परिवार के सदस्यों के सिर पर घर की महिलाएं लाग हरेला, लाग बग्वाली, जी रयै, जागि रयै, हिमालन ह्यूं छन जाणे, दुबाक जाड़ा छन जाणे, जी रयै, जागि रयै के आशीर्वचनों के साथ पूजन करेंगी।
हरेला श्रावण संक्रांति के दिन मनाया जाता है। अतीतकाल से यह परंपरा चली आ रही है। हरेला पर्व को मनाने के पीछे यही तर्क है कि कुमाऊं के लोग काफी पहले से पर्यावरण संरक्षण के प्रति सजग रहे थे। सावन में अच्छी बारिश होती है। इसलिए संक्रांति से सात दिन पहले एक बर्तन में मिट्टी डालकर सप्तधान्य बोए जाते हैं। यदि सप्तधान्य के यह बीज बेहतरीन ढंग से उग जाएं तो उस बार अच्छी फसल की उम्मीद होती है। यदि किसी वर्ष हरेला के सप्तधान्य सही ढंग से नहीं उग पाए तो यह अनुमान लगाया जाता है कि फसलों का उत्पादन कम होगा। इस कारण हरेला कृषि से जुड़ा पर्व भी है। यह अच्छी बारिश, अच्छी फसल के साथ-साथ परिवार की सुख समृद्धि का भी प्रतीक है।
इतिहासकार डा. मदन चंद्र भट्ट का कहना है कि ऋग्वेद में तीन देवियों इला, पृथ्वी और सरस्वती का उल्लेख है। हरेला के दिन पृथ्वी देवी का पूजन होता है। सावन के महीने में होने वाले हरेले का संबंध भगवान शिव से भी जोड़ा गया है। वैसे कुमाऊं में चैत्र नवरात्र, शारदीय नवरात्र के समय भी हरेला उगाने की परंपरा है, लेकिन श्रावण संक्रांति के दिन मनाए जाने वाले हरेला पर्व का महत्व ज्यादा है। अब हरेला पर्व का सरकारीकरण होने लगा है। सरकार भी इस मौके पर कई कार्यक्रम तय करती है।
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हरेला श्रावण संक्रांति के दिन मनाया जाता है। अतीतकाल से यह परंपरा चली आ रही है। हरेला पर्व को मनाने के पीछे यही तर्क है कि कुमाऊं के लोग काफी पहले से पर्यावरण संरक्षण के प्रति सजग रहे थे। सावन में अच्छी बारिश होती है। इसलिए संक्रांति से सात दिन पहले एक बर्तन में मिट्टी डालकर सप्तधान्य बोए जाते हैं। यदि सप्तधान्य के यह बीज बेहतरीन ढंग से उग जाएं तो उस बार अच्छी फसल की उम्मीद होती है। यदि किसी वर्ष हरेला के सप्तधान्य सही ढंग से नहीं उग पाए तो यह अनुमान लगाया जाता है कि फसलों का उत्पादन कम होगा। इस कारण हरेला कृषि से जुड़ा पर्व भी है। यह अच्छी बारिश, अच्छी फसल के साथ-साथ परिवार की सुख समृद्धि का भी प्रतीक है।
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इतिहासकार डा. मदन चंद्र भट्ट का कहना है कि ऋग्वेद में तीन देवियों इला, पृथ्वी और सरस्वती का उल्लेख है। हरेला के दिन पृथ्वी देवी का पूजन होता है। सावन के महीने में होने वाले हरेले का संबंध भगवान शिव से भी जोड़ा गया है। वैसे कुमाऊं में चैत्र नवरात्र, शारदीय नवरात्र के समय भी हरेला उगाने की परंपरा है, लेकिन श्रावण संक्रांति के दिन मनाए जाने वाले हरेला पर्व का महत्व ज्यादा है। अब हरेला पर्व का सरकारीकरण होने लगा है। सरकार भी इस मौके पर कई कार्यक्रम तय करती है।
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