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पुराने वाहनों का फिटनेस प्रमाणपत्र हर साल बनेगा
Updated Tue, 18 Jul 2017 11:03 PM IST
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पिथौरागढ़। यात्रियों को ढोने या निजी उपयोग के लिए जितने भी वाहन सड़कों पर दौड़ते हैं, उनका फिटनेस प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य होता है। नए वाहन के लिए पहले दो साल तक इसकी बाध्यता नहीं होती, लेकिन दो साल बाद वाहन का फिटनेस प्रमाणपत्र हर वर्ष लेना जरूरी है। हालांकि, जब कोई सड़क दुर्घटना होती है तो वाहनों के फिटनेस को लेकर भी सवाल उठने लगते हैं। जिले में इस समय यात्रियों को ढोने के काम में 1700 कारें और 1800 जीपें लगी हैं। इन सभी को फिटनेस प्रमाण जारी किए गए हैं।
परिवहन विभाग में यह व्यवस्था है कि यदि कोई नया वाहन खरीदा जाता है और उसका परिवहन विभाग में पंजीकरण होने के बाद दो वर्ष तक फिटनेस प्रमाणपत्र लेने की जरूरत नहीं होती, लेकिन तीसरे वर्ष से उसे हर साल फिटनेस प्रमाणपत्र लेना जरूरी होता है। फिटनेस प्रमाणपत्र बनाते समय यदि वाहन में किसी प्रकार की तकनीकी कमी हो तो उसे दूर करने के लिए भी कहा जाता है। यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और वाहनों के फिटनेस की जांच नियमित की जाती है। सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी नवीन सिंह का कहना है कि वाहन चालक खुद ही फिटनेस के प्रति सजग रहते हैं। अन्यथा उनको कार्रवाई का सामना करना पड़ता है।
जिले में 1990 के बाद यात्रियों को ढोने वाले निजी वाहनों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। रोडवेज एवं अन्य सार्वजनिक परिवहन की लचर सेवाओं का फायदा निजी वाहन स्वामियों ने उठाना शुरू कर दिया। इस समय जिले के सभी आंतरिक मार्गों, राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य राजमार्ग पर यात्रियों को ढोने का काम यही निजी वाहन कर रहे हैं। ग्रामीण कस्बों से मैदान के शहरों तक नियमित सेवाएं संचालित हो रही हैं।
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रोडवेज का फोरमैन करता है वाहनों की जांच
परिवहन विभाग के पास अपना फोरमैन नहीं है। पूरे पर्वतीय अंचल में वाहनों की फिटनेस के लिए परिवहन विभाग रोडवेज के फोरमैन की मदद लेता है। जिस दिन वाहनों का फिटनेस कराना हो उस दिन रोडवेज के फोरमैन को बुला लिया जाता है। सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी नवीन सिंह ने बताया कि पूरे पर्वतीय अंचल में यही व्यवस्था चली आ रही है।
फिटनेस न होने पर 21 वाहनों का चालान
परिवहन विभाग की टीम ने जून में 21 वाहनों का फिटनेस प्रमाणपत्र न होने के कारण चालान कर दिया। यह टीम जिस रूट पर जाती है, उसी रूट पर वाहनों की चेकिंग शुरू हो जाती है। वाहन में कागजातों की कमी या फिर अन्य प्रकार की दिक्कतें होने पर वाहन को सीज कर दिया जाता है।
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परिवहन विभाग में यह व्यवस्था है कि यदि कोई नया वाहन खरीदा जाता है और उसका परिवहन विभाग में पंजीकरण होने के बाद दो वर्ष तक फिटनेस प्रमाणपत्र लेने की जरूरत नहीं होती, लेकिन तीसरे वर्ष से उसे हर साल फिटनेस प्रमाणपत्र लेना जरूरी होता है। फिटनेस प्रमाणपत्र बनाते समय यदि वाहन में किसी प्रकार की तकनीकी कमी हो तो उसे दूर करने के लिए भी कहा जाता है। यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और वाहनों के फिटनेस की जांच नियमित की जाती है। सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी नवीन सिंह का कहना है कि वाहन चालक खुद ही फिटनेस के प्रति सजग रहते हैं। अन्यथा उनको कार्रवाई का सामना करना पड़ता है।
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जिले में 1990 के बाद यात्रियों को ढोने वाले निजी वाहनों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। रोडवेज एवं अन्य सार्वजनिक परिवहन की लचर सेवाओं का फायदा निजी वाहन स्वामियों ने उठाना शुरू कर दिया। इस समय जिले के सभी आंतरिक मार्गों, राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य राजमार्ग पर यात्रियों को ढोने का काम यही निजी वाहन कर रहे हैं। ग्रामीण कस्बों से मैदान के शहरों तक नियमित सेवाएं संचालित हो रही हैं।
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रोडवेज का फोरमैन करता है वाहनों की जांच
परिवहन विभाग के पास अपना फोरमैन नहीं है। पूरे पर्वतीय अंचल में वाहनों की फिटनेस के लिए परिवहन विभाग रोडवेज के फोरमैन की मदद लेता है। जिस दिन वाहनों का फिटनेस कराना हो उस दिन रोडवेज के फोरमैन को बुला लिया जाता है। सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी नवीन सिंह ने बताया कि पूरे पर्वतीय अंचल में यही व्यवस्था चली आ रही है।
फिटनेस न होने पर 21 वाहनों का चालान
परिवहन विभाग की टीम ने जून में 21 वाहनों का फिटनेस प्रमाणपत्र न होने के कारण चालान कर दिया। यह टीम जिस रूट पर जाती है, उसी रूट पर वाहनों की चेकिंग शुरू हो जाती है। वाहन में कागजातों की कमी या फिर अन्य प्रकार की दिक्कतें होने पर वाहन को सीज कर दिया जाता है।