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अमन सभा में गूंजा ‘मालकम गो वैक’ का नारा
Pauri
Updated Fri, 17 Oct 2014 05:32 AM IST
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बैजरो। पौड़ी में अंग्रेजों की अमन सभा चल रही थी। लार्ड गवर्नर मालकम हेली का भाषण चल रहा था। इसी बीच अचानक एक व्यक्ति तिरंगा लहराते हुए जोर-जोर से नारे लगाने लगा, ‘मालकम गो वैक’ ‘कांग्रेस जिंदाबाद’ इन नारों को सुनकर हेली का भाषण थम गया। सभा में मौजूद सारी भीड़ उस व्यक्ति की तरफ देख रही थी जो सीना ताने खड़ा था और पुलिस के जवान उसपर लाठियां बरसा रहे थे। यह बहादुर व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि जयानंद भारतीय था। जिसने अपनी बहादुरी से न सिर्फ अंग्रेजों के नाक में दम कर दिया था बल्कि उनके चाटुकारों के भी माथे पर पसीना ला दिया था।
17 अक्तूबर 1881 में पौड़ी जिले के वर्तमान में बीरोंखाल ब्लाक के अरकंडाई गांव में छविलाल के परिवार में जन्मे जयानंद भारतीय ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में सक्रिय भूमिका निभाई थी। छह सितंबर 1932 को पौड़ी में अमन सभा का आयोजन किया था। सभा में लार्ड गवर्नर मालकम हेली मुख्य वक्ता के तौर पर आए थे। अंग्रेज समर्थकों ने गवर्नर को बताया गया कि गढ़वाल मे कोई भी बागी नहीं है। लेकिन अपने आस्तीन में तिरंगा छिपाकर सभा ले जाकर फहराते हुए जयानंद ने वहां खलबली मचा दी। जिसके बाद अंग्रेजों ने उनको काफी यातनाएं दी। लार्ड गवर्नर ने वापस लौटते समय कोटद्वार रेलवे स्टेशन पर समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा था कि जयानंद चाहता तो मुझे गोली मार सकता था। जान बचाने के लिए उसका धन्यवाद करता हूं। जयानंद स्वतंत्रता के छोटे बड़े आंदोलनों में भागीदारी करते रहे। कई बार जेल गए, कई यातनाएं सही। इसके साथ ही उन्होंने अपने समाज में व्याप्त बुराई के खिलाफ न सिर्फ लड़ा बल्कि उसको समाप्त भी कराया।
जयानंद ने 1923 में उत्तराखंड में चर्चित डोली पालकी आंदोलन शुरू किया। बीस वर्ष के लंबे आंदोलन के बाद वह अनुसूचित जाति की बेटियों को भी शादी के बाद डोली पर बिठाकर ससुराल तक भिजवाने में सफल रहे थे। छुआछूत के खिलाफ भी वह लगातार लड़ते रहे। दलित समुदाय को एक मंच पर लाने और आर्य समाज के फैलाव में भी उनका बड़ा योगदान रहा।
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अजनबी बने जयानंद
- गढ़वाल के लिए गौरव के रूप में खुद को स्थापित करने वाले व्यक्ति आज पूरे प्रदेश यहां तक कि गृह जनपद में भी अजनबी बनकर रह गए हैं। उनको पहचान दिलाने के लिए आज तक किसी भी सरकार ने कोई विशेष काम नहीं किया। जयानंद भारतीय जिला बनाओ संघर्ष समिति के महामंत्री प्रदीप कुमार निर्मल का कहना है कि उनके नाम पर जिला बनाया जाए तो यह उनके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।
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17 अक्तूबर 1881 में पौड़ी जिले के वर्तमान में बीरोंखाल ब्लाक के अरकंडाई गांव में छविलाल के परिवार में जन्मे जयानंद भारतीय ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में सक्रिय भूमिका निभाई थी। छह सितंबर 1932 को पौड़ी में अमन सभा का आयोजन किया था। सभा में लार्ड गवर्नर मालकम हेली मुख्य वक्ता के तौर पर आए थे। अंग्रेज समर्थकों ने गवर्नर को बताया गया कि गढ़वाल मे कोई भी बागी नहीं है। लेकिन अपने आस्तीन में तिरंगा छिपाकर सभा ले जाकर फहराते हुए जयानंद ने वहां खलबली मचा दी। जिसके बाद अंग्रेजों ने उनको काफी यातनाएं दी। लार्ड गवर्नर ने वापस लौटते समय कोटद्वार रेलवे स्टेशन पर समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा था कि जयानंद चाहता तो मुझे गोली मार सकता था। जान बचाने के लिए उसका धन्यवाद करता हूं। जयानंद स्वतंत्रता के छोटे बड़े आंदोलनों में भागीदारी करते रहे। कई बार जेल गए, कई यातनाएं सही। इसके साथ ही उन्होंने अपने समाज में व्याप्त बुराई के खिलाफ न सिर्फ लड़ा बल्कि उसको समाप्त भी कराया।
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जयानंद ने 1923 में उत्तराखंड में चर्चित डोली पालकी आंदोलन शुरू किया। बीस वर्ष के लंबे आंदोलन के बाद वह अनुसूचित जाति की बेटियों को भी शादी के बाद डोली पर बिठाकर ससुराल तक भिजवाने में सफल रहे थे। छुआछूत के खिलाफ भी वह लगातार लड़ते रहे। दलित समुदाय को एक मंच पर लाने और आर्य समाज के फैलाव में भी उनका बड़ा योगदान रहा।
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अजनबी बने जयानंद
- गढ़वाल के लिए गौरव के रूप में खुद को स्थापित करने वाले व्यक्ति आज पूरे प्रदेश यहां तक कि गृह जनपद में भी अजनबी बनकर रह गए हैं। उनको पहचान दिलाने के लिए आज तक किसी भी सरकार ने कोई विशेष काम नहीं किया। जयानंद भारतीय जिला बनाओ संघर्ष समिति के महामंत्री प्रदीप कुमार निर्मल का कहना है कि उनके नाम पर जिला बनाया जाए तो यह उनके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।