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जंगलात का मुखबिरी तंत्र हुआ फेल
ब्यूरो/ हल्द्वानी
Updated Wed, 16 Mar 2016 02:05 AM IST
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बाघ
- फोटो : अमर उजाला
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पांच बाघों को मारने के बाद शिकारियों ने गड्ढों में दबा दिया, लेकिन जंगलात और कार्बेट पार्क को खबर नहीं लगी। ये घटनाएं बताती हैं कि वन महकमे का मुखबिरी और सूचना तंत्र फेल हो चला है। कहने को मुख्य वन संरक्षक इंटेलीजेंस जैसा पद भी बनाया गया है, लेकिन केवल नाम भर का है। कार्बेट पार्क को छोड़ दें तो स्थिति यह है कि गौला कार्पस से केवल तराई के पांच प्रभागों में एक लाख रुपये सालाना यानी 273 रुपये प्रतिदिन मुखबिरी पर खर्च किया जा रहा है। ऐसे में मुखबिर कितना काम करते होंगे खुद-ब-खुद समझा जा सकता है।
पांच बाघों की खाल एक साथ बरामद होने के बाद वन महकमे में खलबली मची है। कार्बेट पार्क में जहां पर बाघ का शिकार होने की बात कही जा रही है, वहां पर शिकारियों ने कई दिन तक रेकी की होगी। बाघ को कड़के में रात में फंसाया गया होगा, तो वह दहाड़ा होगा। सन्नाटा होने की वजह से उसकी आवाज दूर तक गई होगी, लेकिन वन कर्मी सुन नहीं सके।
स्थिति यह है कि तस्करों, शिकारियों के पास बाघ समेत दूसरी संवेदनशील सूचनाओं का अपना तंत्र है, जबकि वन महकमे का तंत्र फेल हो चला है। विभाग ने मुख्य वन संरक्षक इंटेलीजेंस जैसा पद है, पर यह केवल नाम का है। कोई धरपकड़ के लिए टीम, संसाधन आदि नहीं दिए गए हैं। सीसीएफ इंटेलीजेंस को दूसरे काम भी दिये जाते रहे हैं। यही नहीं प्रभागों के पास शिकारियों और तस्करों का कोई भी एकीकृत डाटा बैंक नहीं है, जिससे वह सूचनाओं का अदान-प्रदान कर सकें।
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जबकि करोड़ों रुपये कैंपा मदों से अधिकारियों के सुविधाओं पर खर्च हो रहा है, लेकिन मुखबिरी तंत्र को विकसित करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाया गया है। स्थानीय स्तर पर गौला कापर्स से तराई के जंगलों के लिए 273 रुपये मिल भी जाते हैं, पहाड़ों में स्थिति और भी खराब बताई जा रही है।
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पांच बाघों की खाल एक साथ बरामद होने के बाद वन महकमे में खलबली मची है। कार्बेट पार्क में जहां पर बाघ का शिकार होने की बात कही जा रही है, वहां पर शिकारियों ने कई दिन तक रेकी की होगी। बाघ को कड़के में रात में फंसाया गया होगा, तो वह दहाड़ा होगा। सन्नाटा होने की वजह से उसकी आवाज दूर तक गई होगी, लेकिन वन कर्मी सुन नहीं सके।
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स्थिति यह है कि तस्करों, शिकारियों के पास बाघ समेत दूसरी संवेदनशील सूचनाओं का अपना तंत्र है, जबकि वन महकमे का तंत्र फेल हो चला है। विभाग ने मुख्य वन संरक्षक इंटेलीजेंस जैसा पद है, पर यह केवल नाम का है। कोई धरपकड़ के लिए टीम, संसाधन आदि नहीं दिए गए हैं। सीसीएफ इंटेलीजेंस को दूसरे काम भी दिये जाते रहे हैं। यही नहीं प्रभागों के पास शिकारियों और तस्करों का कोई भी एकीकृत डाटा बैंक नहीं है, जिससे वह सूचनाओं का अदान-प्रदान कर सकें।
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जबकि करोड़ों रुपये कैंपा मदों से अधिकारियों के सुविधाओं पर खर्च हो रहा है, लेकिन मुखबिरी तंत्र को विकसित करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाया गया है। स्थानीय स्तर पर गौला कापर्स से तराई के जंगलों के लिए 273 रुपये मिल भी जाते हैं, पहाड़ों में स्थिति और भी खराब बताई जा रही है।