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चिंता: कीटनाशकों के छिड़काव से मधुमक्खियों को खतरा, परागण घटने से फल-बीज उत्पादन पर असर की आशंका

Sat, 17 Oct 2026 11:29 AM IST
Heera संदीप कुमार
संदीप कुमार Published by: Heera Updated Sat, 17 Oct 2026 11:29 AM IST
सार

खेतों में रासायनिक कीटनाशकों का अंधाधुंध छिड़काव मधुमक्खियों और तितलियों के लिए खतरा बन रहा है। फूल आने के दौरान स्प्रे इन परागणकर्ताओं के लिए जानलेवा हो सकता है। 

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The danger to bees from pesticide spraying
मधुमक्खी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

फसल बचाने और उत्पादन बढ़ाने की होड़ में खेतों में हो रहा रासायनिक कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल अब मधुमक्खियों और तितलियों के अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है। खासकर फूल आने के दौरान किया जाने वाला छिड़काव परागण करने वाले इन लाभकारी कीटों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है।

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उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद (यूसीबी) के क्षेत्रीय केंद्र पटवाडांगर के प्रभारी व वैज्ञानिक डॉ. सुमित पुरोहित के अनुसार, अध्ययन में खेतों में रासायनिक छिड़काव के बाद मधुमक्खियों और तितलियों के मृत पाए जाने की घटनाएं सामने आई हैं। इनकी संख्या में कमी आने से परागण प्रभावित हो सकता है जिसका सीधा असर फल और बीज बनने की प्रक्रिया पर पड़ने की आशंका है। ऐसे में कीट नियंत्रण के उपाय ही कृषि और प्राकृतिक व्यवस्था के लिए नई चुनौती बन सकते हैं।

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पहाड़ से मैदान तक मधुमक्खी पालन की अलग प्रजातियां
डॉ. पुरोहित के अनुसार, उत्तराखंड में मधुमक्खी पालन के लिए प्रमुख रूप से दो प्रजातियां इस्तेमाल की जाती हैं। इनमें एपिस सेरेना इंडिका पहाड़ी क्षेत्रों में पाली जाती है, जबकि एपिस मेलिफेरा का पालन मैदानी क्षेत्रों में किया जाता है। मधुमक्खियों का संरक्षण केवल शहद उत्पादन के लिहाज से ही नहीं, बल्कि कृषि और प्राकृतिक वनस्पतियों में परागण की प्रक्रिया को बनाए रखने के लिए भी महत्वपूर्ण है।

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मधुमक्खियां फसलों, फलदार पौधों और प्राकृतिक वनस्पतियों में परागण की अहम भूमिका निभाती हैं। तितलियां समेत दूसरे परागणकर्ता भी जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में उन्होंने फूल आने के समय विशेष सावधानी बरतें और पर्यावरण के अनुकूल कृषि पद्धतियां अपनाएं। - डॉ. सुमित पुरोहित, वैज्ञानिक

 

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