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UK: चिंता...प्रतिस्पर्धा के तनाव को नहीं सह पा रहा स्ट्रेस हार्मोन, बच्चों और युवाओं में बढ़ रही परेशानी

Tue, 21 Jul 2026 11:20 AM IST
Heera अमर उजाला नेटवर्क, हल्द्वानी
अमर उजाला नेटवर्क, हल्द्वानी Published by: Heera Updated Tue, 21 Jul 2026 11:20 AM IST
सार

प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के लिए बढ़ता मानसिक दबाव लंबे समय तक तनाव का कारण बनता है, जिससे शरीर में स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ जाता है। यह मस्तिष्क की कार्यप्रणाली, सीखने की क्षमता और भावनात्मक संतुलन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

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Stress hormones are unable to bear the stress of competition
सांकेतिक तस्वीर

विस्तार

प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा व्यवस्था में बेहतर अंक लाने और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता पाने का दबाव बढ़ रहा है। लंबे समय तक तनाव रहने पर शरीर में कॉर्टिसोल हार्मोन (स्ट्रेस हार्मोन) का स्तर बढ़ जाता है। इसका सीधा प्रभाव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली, सीखने की क्षमता और भावनात्मक संतुलन पर पड़ सकता है।

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राजकीय मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग की प्रभारी विभागाध्यक्ष डॉ. तनुश्री गौड़ के अनुसार कॉर्टिसोल तनाव के समय सबसे ज्यादा सक्रिय हो जाता है। यह शरीर में बीपी और शुगर को कंट्रोल करने के साथ-साथ इम्युनिटी बढ़ाने के लिए भी जरूरी है लेकिन जब यह लंबे समय तक हाई रहता है तो शरीर के लिए नुकसानदायक बन जाता है।

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बोर्ड और प्रतियोगी परीक्षा का दबाव और पढ़ाई के बोझ की वजह से बच्चों में कॉर्टिसोल का स्तर तेजी से बढ़ रहा है। जब कॉर्टिसोल लगातार उच्च स्तर पर रहता है तो बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। कई बार इससे बीपी और शुगर की समस्या भी शुरू हो जाती है। तनाव से शरीर में कॉर्टिसोल हार्मोन बढ़ता है। इससे मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स प्रभावित होता है जिसका असर ध्यान, याददाश्त, निर्णय क्षमता और भावनात्मक नियंत्रण पर पड़ता है।

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केस स्टडी 1 
हल्द्वानी निवासी एक 24 वर्षीय युवक बीते कुछ समय यूपीएससी की तैयारी कर रहा था। बीती परीक्षा में वह सफल नहीं हुआ और तनाव में चला गया। उसकी मानसिक रोग विभाग की ओर से काउंसलिंग की गई।


केस स्टडी 2
हल्द्वानी के एक स्कूल की 15 साल की छात्रा वाइवा के दौरान किसी सवाल का जवाब नहीं दे पाई। इससे वह तनाव में आ गई और वह पैनिक डिसऑर्डर की शिकार हो गई। मनोचिकित्सकों ने छात्रा और उसके परिवार को समझाया।
 

अभिभावकों को सलाह
डॉ. गौड़ ने अभिभावकों को सलाह दी है कि वे बच्चों पर केवल परिणाम का दबाव न डालें बल्कि उनकी मेहनत और सीखने की प्रक्रिया की भी सराहना करें। बच्चों से नियमित बातचीत करें, उनकी बात बिना आलोचना के सुनें और यह विश्वास दिलाएं कि एक परीक्षा पूरे जीवन का फैसला नहीं करती। साथ ही 7–9 घंटे की पर्याप्त नींद, संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, योग, खेलकूद और सीमित स्क्रीन टाइम तनाव कम करने में मददगार हो सकते हैं।

 

परीक्षा महत्वपूर्ण है लेकिन यह किसी बच्चे की बुद्धिमत्ता या भविष्य का अंतिम पैमाना नहीं है। यदि बच्चे में दो सप्ताह से अधिक समय तक लगातार उदासी, चिड़चिड़ापन, नींद-भूख में बदलाव, पढ़ाई से दूरी या नकारात्मक विचार दिखें तो इसे सामान्य तनाव न मानें। ऐसे में तुरंत मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लें। समय पर सहयोग से अधिकतर समस्याओं का समाधान संभव है। - डॉ. तनुश्री गौड़, मानसिक रोग विशेषज्ञ

 

 

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