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Nainital News: अभिभावकों पर वित्तीय बोझ के खिलाफ शांति मार्च
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हल्द्वानी। शिक्षा के व्यवसायीकरण और अभिभावकों पर बढ़ते वित्तीय बोझ के खिलाफ रविवार को स्थानीय नागरिक, अभिभावकों, शिक्षकों और छात्रों ने मिलकर बुद्ध पार्क में शांति मार्च का आयोजन किया। इस दौरान स्कूल यूनिफॉर्म, पुस्तक आपूर्ति में एकाधिकार, महंगी शैक्षिक सामग्री आदि मुद्दे उठे।
मार्च के दौरान कहा गया कि स्कूल यूनिफॉर्म में बार-बार बदलाव और अनावश्यक ब्रांडेड सामान से अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। स्कूल के लोगो वाली नोटबुक की अनिवार्यता की जा रही और पुस्तक आपूर्ति में एकाधिकार हो रहा है। कहा कि निजी स्कूलों में शिक्षकों का शोषण, कम वेतन और अत्यधिक कार्यभार की शिकायतें भी आ रही हैं। वहीं जीएसटी बिलिंग में पारदर्शिता की कमी देखने को मिल रही है।
शांति मार्च में एकजुटता और बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाने की अपील की गई। आयोजक दीपचंद्र पांडे ने कहा कि यह सिर्फ हल्द्वानी का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है। एनसीईआरटी किताबों से जुड़े मुद्दों पर कहा कि सरकार की 20 प्रतिशत छूट के बावजूद आपूर्तिकर्ताओं को 2.5 से 12 प्रतिशत छूट मिल रही है, जिससे अभिभावकों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ रहा है। सभी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और उत्तराखंड सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। इस मौके पर एक ऑनलाइन याचिका भी तैयार की गई।
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मार्च के दौरान कहा गया कि स्कूल यूनिफॉर्म में बार-बार बदलाव और अनावश्यक ब्रांडेड सामान से अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। स्कूल के लोगो वाली नोटबुक की अनिवार्यता की जा रही और पुस्तक आपूर्ति में एकाधिकार हो रहा है। कहा कि निजी स्कूलों में शिक्षकों का शोषण, कम वेतन और अत्यधिक कार्यभार की शिकायतें भी आ रही हैं। वहीं जीएसटी बिलिंग में पारदर्शिता की कमी देखने को मिल रही है।
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शांति मार्च में एकजुटता और बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाने की अपील की गई। आयोजक दीपचंद्र पांडे ने कहा कि यह सिर्फ हल्द्वानी का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है। एनसीईआरटी किताबों से जुड़े मुद्दों पर कहा कि सरकार की 20 प्रतिशत छूट के बावजूद आपूर्तिकर्ताओं को 2.5 से 12 प्रतिशत छूट मिल रही है, जिससे अभिभावकों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ रहा है। सभी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और उत्तराखंड सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। इस मौके पर एक ऑनलाइन याचिका भी तैयार की गई।
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