{"_id":"5727a3a54f1c1b63705cdc48","slug":"forest-fire-fighting-plane-had-earlier-trial","type":"story","status":"publish","title_hn":"दावाग्नि बुझाने को पहले भी हो चुका हवाई जहाज का ट्रायल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
दावाग्नि बुझाने को पहले भी हो चुका हवाई जहाज का ट्रायल
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी।
Updated Tue, 03 May 2016 12:29 AM IST
विज्ञापन
हेलीकाप्टर
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
यूपी के समय भी अमेरिका की तर्ज पर दावाग्नि नियंत्रण करने के लिए हवाई जहाज से लेकर हेलिकाप्टर तक मुहैया कराये गए थे। इसका सेंटर हल्द्वानी (वर्तमान में मुख्य वन संरक्षक विधि प्रकोष्ठ कार्यालय) में बनाया गया था। पर कुछ साल चलने के बाद यह प्रोजेक्ट बंद हो गया है। उस दौर में जो आधुनिक वाहन दिये गए थे, वह अब जंक खा रहे हैं। स्थिति यह है कि उत्तराखंड बनने के बाद दावाग्नि नियंत्रण के लिए इसी जगह पर सीसीएफ पर्यावरण कार्यालय खोला गया। बाद में यह कार्यालय भी शिफ्ट हो गया।
जंगल की आग काबू करने को अमेरिका की तर्ज पर यूएनडीपी के सहयोग से 1987 में माडर्न फारेस्ट फायर कंट्रोल प्रोजेक्ट यूपी और महाराष्ट्र में ट्रायल के तौर पर शुरू किया गया। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सचिव टीएन शेषन के निर्देशन में योजना जब शुरू हुई, तो उस समय एकीकृत यूपी में हल्द्वानी में यह कार्यालय खोला गया। उस समय प्रोजेक्ट में वन संरक्षक, तीन डीएफओ, रेंजर आदि की तैनाती की गई। तत्कालीन प्रोजेक्ट इंचार्ज व बाद में प्रमुख वन संरक्षक पद से रिटायर हुए आईडी पांडे बताते हैं, उस समय दावाग्नि के समय हवाई जहाज, हेलिकाप्टर दिया गया।
इन दोनों का नियंत्रण एयर फोर्स के पास ही होता था। हेलिकाप्टर की उड़ान के लिए खास तौर पर नौकुचियाताल और विनायक में हेलीपेड और 19 जगहों पर वाच टावर बनाये गए। हेलिकाप्टर तब नौकुचियाताल से पानी भर जंगल पर बौछार करते थे। इसके अलावा फायर बिग्रेड की तर्ज पर पहाड़ के लिए छोटे वाहन स्लीप कोन यूनिट (एक हजार लीटर क्षमता) और मैदान के लिए बड़े अग्निशमन वाहन दिये गए। इसके अलावा फायर लाइन बनाने के लिए स्केपर, बडे़ डोजर आदि दिये गए थे। अधिकारियों के अनुसार कुछ ही साल चलने के बाद 1990 में यह प्रोजेक्ट बंद हो गया।
विज्ञापन
आज स्थिति यह है कि उस समय खरीदे गए उपकरण कार्यालय में जंक खा रहे हैं। बाद में इसी कार्यालय में राज्य बनने के बाद सीसीएफ पर्यावरण कार्यालय खोला गया, जहां से प्रदेश में वनाग्नि नियंत्रण कार्यक्रम चलता था। बाद में इस कार्यालय को देहरादून में शिफ्ट कर दिया गया। बाद में सीसीएफ विधि प्रकोष्ठ को यह कार्य सौंप दिया गया। इस वक्त भी सीसीएफ विधि प्रकोष्ठ, मुख्य वन संरक्षक अनुसंधान के साथ नोडल अधिकारी वनाग्नि का काम एक ही अधिकारी को सौंपा गया है।
अमेरिका गये थे ट्रेनिंग लेने
हल्द्वानी। अमेरिका में जिस तरह से आग बुझाई जाती है, उसकी ट्रेनिंग लेने के लिए वन विभाग के अधिकारी अमेरिका गए थे। अधिकारियों के अनुसार अमेरिका में हेलिकाप्टर की सीरीज से आग बुझाती है, एक बाद एक हेलिकाप्टर आते जाते हैं, जिससे आग के दुबारा भड़कने का खतरा कम हो जाता है। पूर्व पीसीसीएफ आईडी पांडे कहते हैं कि इसके अलावा वह खास तरह का कलर भी डालते हैं, जिससे इलाके की पहचान कर ली जाती है।
बादलों पर टिकी रहती आस
हल्द्वानी। दावाग्नि की घटना हर साल होती है। इससे निपटने के लिए 15 फरवरी से ही अभियान शुरू होता है। पर बाद के दौर में आग नियंत्रण के लिए एक तरह से मौसम और जंगलात पर ही सिस्टम निर्भर हो गया। सभी की निगाह आसमान पर लगी रहती थी, कब बरसात हो और दावाग्नि खत्म हो। पर इस बार राष्ट्रपति शासन में पिछली बार की तुलना में कार्यवाही तेज हुई है।
झापा, झाड़ूू का इस्तेमाल
हल्द्वानी। अभी पेड़ों की टहनियों से झापा बनाकर आग बुझाने का काम होता है। इसमें आग को पीट- पीट कर बुझाया जाता है। इसके अलावा लोहे का झाड़ू आदि का इस्तेमाल हो रहा है। इसी तरह की तकनीक और उपकरण के मानक केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने भी तय किए हैं।
विज्ञापन
जंगल की आग काबू करने को अमेरिका की तर्ज पर यूएनडीपी के सहयोग से 1987 में माडर्न फारेस्ट फायर कंट्रोल प्रोजेक्ट यूपी और महाराष्ट्र में ट्रायल के तौर पर शुरू किया गया। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सचिव टीएन शेषन के निर्देशन में योजना जब शुरू हुई, तो उस समय एकीकृत यूपी में हल्द्वानी में यह कार्यालय खोला गया। उस समय प्रोजेक्ट में वन संरक्षक, तीन डीएफओ, रेंजर आदि की तैनाती की गई। तत्कालीन प्रोजेक्ट इंचार्ज व बाद में प्रमुख वन संरक्षक पद से रिटायर हुए आईडी पांडे बताते हैं, उस समय दावाग्नि के समय हवाई जहाज, हेलिकाप्टर दिया गया।
विज्ञापन
इन दोनों का नियंत्रण एयर फोर्स के पास ही होता था। हेलिकाप्टर की उड़ान के लिए खास तौर पर नौकुचियाताल और विनायक में हेलीपेड और 19 जगहों पर वाच टावर बनाये गए। हेलिकाप्टर तब नौकुचियाताल से पानी भर जंगल पर बौछार करते थे। इसके अलावा फायर बिग्रेड की तर्ज पर पहाड़ के लिए छोटे वाहन स्लीप कोन यूनिट (एक हजार लीटर क्षमता) और मैदान के लिए बड़े अग्निशमन वाहन दिये गए। इसके अलावा फायर लाइन बनाने के लिए स्केपर, बडे़ डोजर आदि दिये गए थे। अधिकारियों के अनुसार कुछ ही साल चलने के बाद 1990 में यह प्रोजेक्ट बंद हो गया।
विज्ञापन
आज स्थिति यह है कि उस समय खरीदे गए उपकरण कार्यालय में जंक खा रहे हैं। बाद में इसी कार्यालय में राज्य बनने के बाद सीसीएफ पर्यावरण कार्यालय खोला गया, जहां से प्रदेश में वनाग्नि नियंत्रण कार्यक्रम चलता था। बाद में इस कार्यालय को देहरादून में शिफ्ट कर दिया गया। बाद में सीसीएफ विधि प्रकोष्ठ को यह कार्य सौंप दिया गया। इस वक्त भी सीसीएफ विधि प्रकोष्ठ, मुख्य वन संरक्षक अनुसंधान के साथ नोडल अधिकारी वनाग्नि का काम एक ही अधिकारी को सौंपा गया है।
अमेरिका गये थे ट्रेनिंग लेने
हल्द्वानी। अमेरिका में जिस तरह से आग बुझाई जाती है, उसकी ट्रेनिंग लेने के लिए वन विभाग के अधिकारी अमेरिका गए थे। अधिकारियों के अनुसार अमेरिका में हेलिकाप्टर की सीरीज से आग बुझाती है, एक बाद एक हेलिकाप्टर आते जाते हैं, जिससे आग के दुबारा भड़कने का खतरा कम हो जाता है। पूर्व पीसीसीएफ आईडी पांडे कहते हैं कि इसके अलावा वह खास तरह का कलर भी डालते हैं, जिससे इलाके की पहचान कर ली जाती है।
बादलों पर टिकी रहती आस
हल्द्वानी। दावाग्नि की घटना हर साल होती है। इससे निपटने के लिए 15 फरवरी से ही अभियान शुरू होता है। पर बाद के दौर में आग नियंत्रण के लिए एक तरह से मौसम और जंगलात पर ही सिस्टम निर्भर हो गया। सभी की निगाह आसमान पर लगी रहती थी, कब बरसात हो और दावाग्नि खत्म हो। पर इस बार राष्ट्रपति शासन में पिछली बार की तुलना में कार्यवाही तेज हुई है।
झापा, झाड़ूू का इस्तेमाल
हल्द्वानी। अभी पेड़ों की टहनियों से झापा बनाकर आग बुझाने का काम होता है। इसमें आग को पीट- पीट कर बुझाया जाता है। इसके अलावा लोहे का झाड़ू आदि का इस्तेमाल हो रहा है। इसी तरह की तकनीक और उपकरण के मानक केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने भी तय किए हैं।