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गूजर : पुनर्वास की आस में बीते गए वर्षों
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उत्तराखंड के वनवासी मूलभूत सुविधाओं से वंचित
- फोटो : अमर उजाला
हल्द्वानी। सुबह के 10:15 बजे हैं। टांडा खत्ता स्थित वन गूजरों के एक घर (झाले) में शादी है। कुछ देर पहले ही वार्ड नंबर 40 नगर निगम रुद्रपुर के पार्षद राजेश कुमार लोकसभा चुनाव प्रचार करके लौटे हैं। चुनावी माहौल में खत्ते के बुजुर्ग अपने विकास की संभावनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। बुजुर्गों की बातों और चेहरों पर उभरी चिंता की लकीरों को देखकर साफ झलक रहा है कि विकास का सूरज मानो यहां कभी निकलता ही नहीं। जब चुनाव आता है तो नेता आते हैं। वोट मांगने और उम्मीद की लौ जला जाते हैं। इसके बावजूद काबिज वनभूमि पर वैधानिक स्वामित्व न मिलने के कारण न तो उन्हें मूलभूत सुविधाएं मिलीं और न ही सुरक्षित स्थल पर उनका पुनर्वास हो सका।
वन गूजर मुगलों के जमाने से जंगलों में ही रहते हैं। घूमंतु जाति, आर्थिकी के कारण उनके निवास स्थान बदलते रहे। अब करीब 40 वर्ष से यहां टांडा जंगल में कई परिवार स्थायी रूप से बस गए। उनकी बस्ती को वन गूजरों का टांडा खत्ता के नाम से जाना जाता है। इस खत्ते में गूजरों के 22 परिवार बसे हैं। इनमें कुल 92 वोटर हैं। इनका मतदान केंद्र सात किमी दूर पत्थरचट्टा में है। उन्हें पहले ग्राम पंचायत कल्याणपुर से भी मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल सकीं लेकिन अब नगर निगम से भी कोरे आश्वासन मात्र मिलते हैं।
पुनर्वास की आस में बीते गए वर्षों
टांडा खत्ता के वन गूजरों मूलभूत सुविधाओं का अभाव
कई चुनाव आए, खत्ते की नहीं बदली तस्वीर
टांडा खत्ते में विकास की हकीकत
खत्ते में रहने वाले वन गूजरों के घर कच्चे हैं। पानी के लिए इन्होंने खुद हैंडपंप लगवाए हैं। सरकारी हैंडपंप नहीं हैं। रोशनी के लिए खत्ते में सोलर लाइटें लगी हैं। पशुपालन, दुग्ध का व्यवसाय, मजदूरी इनकी आय के साधन हैं। गांव में सिर्फ प्राथमिक विद्यालय होने के कारण आगे की पढ़ाई मुश्किल होती है। किसी भी व्यक्ति ने उच्च शिक्षा हासिल नहीं की। इस कारण गूजरों के खत्ते में सबसे अधिक आठवीं कक्षा तक पढ़े सिर्फ तीन लोग हैं। इनके नाम शमशाद अली, मो. अली, इनाम अली हैं। वृद्धा, विधवा, दिव्यांग पेंशन किसी को नहीं मिली। राशन कार्ड, स्थायी निवास प्रमाणपत्र बनवाना तक मुश्किल होता है। इस खत्ते के वोटरों ने अपना मत देकर सांसद, विधायक, पार्षद चुन लिया, लेकिन इनमें से किसी ने भी खुद कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा। तीन पीढ़ी या 75 साल से वनवासी होने के सबूत के अभाव में वह वन अधिकार कानून (एफआरए) का भी लाभ नहीं ले सके।
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वन गूजरों के सामने समस्याएं
यहां मौजूद मो. यूसुफ, मो. शफी, मो. बशीर, गुलाम रसूल, अब्दुल रहीम, अब्दुल करीम से बातचीत करने पर कथित विकास की काली तस्वीर सामने आती है। इनकी मांग है कि सरकार और कुछ करे न करे सिर्फ उनका पुनर्वास कर दे। उनका कहना है कि राजाजी टाइगर रिजर्व के गूजरों का पुनर्वास हरिद्वार के पथरी और गैंडीखत्ता में किया गया है तो उनका पुनर्वास क्यों नहीं किया गया?
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वन गूजर मुगलों के जमाने से जंगलों में ही रहते हैं। घूमंतु जाति, आर्थिकी के कारण उनके निवास स्थान बदलते रहे। अब करीब 40 वर्ष से यहां टांडा जंगल में कई परिवार स्थायी रूप से बस गए। उनकी बस्ती को वन गूजरों का टांडा खत्ता के नाम से जाना जाता है। इस खत्ते में गूजरों के 22 परिवार बसे हैं। इनमें कुल 92 वोटर हैं। इनका मतदान केंद्र सात किमी दूर पत्थरचट्टा में है। उन्हें पहले ग्राम पंचायत कल्याणपुर से भी मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल सकीं लेकिन अब नगर निगम से भी कोरे आश्वासन मात्र मिलते हैं।
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पुनर्वास की आस में बीते गए वर्षों
टांडा खत्ता के वन गूजरों मूलभूत सुविधाओं का अभाव
कई चुनाव आए, खत्ते की नहीं बदली तस्वीर
टांडा खत्ते में विकास की हकीकत
खत्ते में रहने वाले वन गूजरों के घर कच्चे हैं। पानी के लिए इन्होंने खुद हैंडपंप लगवाए हैं। सरकारी हैंडपंप नहीं हैं। रोशनी के लिए खत्ते में सोलर लाइटें लगी हैं। पशुपालन, दुग्ध का व्यवसाय, मजदूरी इनकी आय के साधन हैं। गांव में सिर्फ प्राथमिक विद्यालय होने के कारण आगे की पढ़ाई मुश्किल होती है। किसी भी व्यक्ति ने उच्च शिक्षा हासिल नहीं की। इस कारण गूजरों के खत्ते में सबसे अधिक आठवीं कक्षा तक पढ़े सिर्फ तीन लोग हैं। इनके नाम शमशाद अली, मो. अली, इनाम अली हैं। वृद्धा, विधवा, दिव्यांग पेंशन किसी को नहीं मिली। राशन कार्ड, स्थायी निवास प्रमाणपत्र बनवाना तक मुश्किल होता है। इस खत्ते के वोटरों ने अपना मत देकर सांसद, विधायक, पार्षद चुन लिया, लेकिन इनमें से किसी ने भी खुद कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा। तीन पीढ़ी या 75 साल से वनवासी होने के सबूत के अभाव में वह वन अधिकार कानून (एफआरए) का भी लाभ नहीं ले सके।
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वन गूजरों के सामने समस्याएं
यहां मौजूद मो. यूसुफ, मो. शफी, मो. बशीर, गुलाम रसूल, अब्दुल रहीम, अब्दुल करीम से बातचीत करने पर कथित विकास की काली तस्वीर सामने आती है। इनकी मांग है कि सरकार और कुछ करे न करे सिर्फ उनका पुनर्वास कर दे। उनका कहना है कि राजाजी टाइगर रिजर्व के गूजरों का पुनर्वास हरिद्वार के पथरी और गैंडीखत्ता में किया गया है तो उनका पुनर्वास क्यों नहीं किया गया?