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घराट बढ़ाएंगे आर्थिकी और रोकेंगे पलायन

Mon, 02 Jan 2017 10:36 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला हरिद्वार
ब्यूरो/अमर उजाला हरिद्वार Updated Mon, 02 Jan 2017 10:36 PM IST
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Gharats enhance economic and block the drain
घ्‍ाराट - फोटो : अमर उजाला

पौड़ी/पाबौ।

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दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में गांव-गांव गेहूं पिसाई के उपयोग होने वाले घराट आर्थिकी को बेहतर करने एवं पलायन रोकने में मददगार साबित हो सकते हैं। बशर्ते कि सरकार इनको संरक्षित एवं पुनर्जीवित करने की दिशा में कार्य करे। देखरेख के अभाव में गढ़वाल मंडल मुख्यालय पौड़ी के पाबौ विकासखंड की तीन पट्टियों के दर्जनभर गांवों में स्थित घराट बंद होने के कगार पर हैं। कई गांवों में उचित देखरेख नहीं होने के चलते घराट बंद भी हो चुके हैं। घराटों को संरक्षित करने के लिए सरकार से ग्रामीण उम्मीद पाले हुए हैं। ग्रामीण इन घराटों पर ही गेहूं पिसाई करते हैं। जिन गांवों में घराट बंद हो चुके हैं, वहां के लोग अन्यत्र गेहूं पिसाई के जाते हैं। इससे उनका समय और धन बर्बाद हो रहा है।
पाबौ ब्लाक के बालीकंडास्यू, कंडारस्यू, ढाईजुली पट्टी के सैंजी, बुरासी, कोटी, स्योलीखंड, तरपालीसैण आदि गांवों के लोगों के लिए घराट न केवल अनाज पीसने, बल्कि आर्थिकी का भी साधन माने जाते हैं। घराट पानी से चलने वाली चक्की है। इन्हें पहाड़ की संस्कृति का प्रतीक माना जाता है, लेकिन उस तरफ सरकार का ध्यान नहीं है। एक तरफ प्रदेश सरकार पहाड़ों से पलायन रोकने और पहाड़ों पर रह रहे लोगों को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए कई योजनाएं बना रही है। कृषि उत्पादन को बढ़ाने की बातें हो रही हैं, परंतु कृषि से ही जुड़े घराटों की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
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सामाजिक कार्यकर्ता सुरेंद्र प्रसाद नौटियाल कहते हैं कि एक समय था, जब एक ही गांव में आठ-दस घराट होते थे। आज स्थिति यह है कि दर्जनों गांवों के लोग एक घराट के भरोसे हैं। वह भी रखरखाव और सरकारी सहयोग नहीं मिलने से बंद होने की कगार पर हैं।
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समाज विज्ञानी डा. वीपी बलोदी कहते हैं कि एक घराट ठीक हालत में हो तो उससे गेहूं की पिसाई ही नहीं इतनी बिजली पैदा हो सकती है कि पांच घर रोशन हो सकते हैं। घराट रोजगार का बहुत बड़ा साधन है। इनके निर्माण की लागत भी कम है। देसी तकनीकी के सहारे यह चलते हैं। गांव के लोगों के लिए एक बेहतर विकल्प है। इससे पलायन भी रुकेगा।
-फोटो

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