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रंग बिरंगी लड़ियों से सजा सिद्धबली मंदिर

Thu, 03 Dec 2015 06:17 PM IST
कोटद्वार
कोटद्वार Updated Thu, 03 Dec 2015 06:17 PM IST
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गढ़वाल और उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों के आस्था और विश्वास के केंद्र कोटद्वार के प्रसिद्ध मंदिर सिद्धबली में तीन दिवसीय वार्षिक महोत्सव शुक्रवार से शुरू हो रहा है। ब्रह्ममुहूर्त में पांच बजे पिंडी महाभिषेक, मंदिर परिक्रमा और ध्वज पूजा के साथ पूरे विधिविधान के साथ महोत्सव प्रारंभ होगा। शाम को मंदिर से नगर तक शोभायात्रा मुख्य आकर्षण का केंद्र रहेगी। महोत्सव के लिए व्यापक प्रबंध कर लिए गए हैं।
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शुक्रवार से शुरू होने वाले इस महोत्सव में निकलने वाली शोभायात्रा का शुभारंभ स्वास्थ्य एवं समाज कल्याण मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी शाम तीन बजे बदरीनाथ मार्ग पर टाटा कामर्शियल भवन के समीप आयोजित कार्यक्रम में करेंगे। शोभायात्रा में दिल्ली का मशहूर नासिक ढोल, राधाकृण्ण का डांडिया रास और वजीरगंज का प्रसिद्ध काली का अखाड़ा मुख्य आकर्षण रहेंगे। इसके अलावा 22 झांकियां, भगवान जगन्नाथ की भव्य झांकी, तीन बैंड, क्षेत्र की कई कीर्तन मंडली भी इसमें चलेंगी। महोत्सव के मेला संयोजक अनिल कंसल और समिति अध्यक्ष कुंज बिहारी देवरानी और उपसचिव रवींद्र जजेड़ी ने बताया कि मेले में उत्तराखंड और यूपी से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की उम्मीद है। कई श्रद्धालु एक दिन पहले ही कोटद्वार पहुंच चुके हैं।
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क्षेत्र के सबसे बड़े इस महोत्सव के लिए बृहस्पतिवार शाम तक मंदिर को सजाने काम पूरा हो चुका है। मंदिर में कई तरह की विद्युत लड़ियां लगाई गई हैं। शाम से ही मंदिर परिसर रंग-बिरंगी बिजली की रोशनी से जगमगाने लगा है। चार से छह दिसंबर तक सिद्धों का डांडा सिद्धबाबा के जयघोषों में डूबा रहेगा। मंदिर समिति ने शहरवासियों से शहर को सजाने की अपील की है। महोत्सव को लेकर शहर में भी खासा उत्साह बना हुआ है। लोग घरों को दीवाली की तरह सजा रहे हैं।
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गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से मिली थी सिद्धबाबा को सिद्धि
मान्यताओं के अनुसार सिद्धबली कत्युर वंश के राजा के पुत्र थे, जिन्हें गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से सिद्धि प्राप्त हुई थी। श्रीसिद्धबली मंदिर ने अपनी पुस्तक में भी इसका उल्लेख किया है। सिद्धबाबा का पहले का नाम हरपाल था। बलवान होने के कारण गुरु गोरखनाथ ने उसे सिद्धियां दिलाई। इसके बाद उन्हें सिद्धबली अर्थात सिद्धबाबा के नाम से जाना गया। मान्यता है कि सिद्धबाबा ने पुराने कोटद्वार स्थित सिद्धों के डांडा नामक पहाड़ी पर कई सालों तक तप किया था। मान्यता के अनुसार जिस वक्त हरपाल सिद्धि प्राप्त कर घर से निकला, उस वक्त उसने अपनी मां से आखिरी बार कुछ पकाकर खाने की इच्छा जाहिर की। आटे और कुछ गुड़ को उन्होंने उसी समय आग में जलाकर रोट बना दिया। तब से सिद्धबली में सवा सेर रोट का प्रसाद चढ़ता है। मंदिर में हर दिन सवा मुठ्ठी या सवा किलो रोट चढ़ता है। मेले में सवा मन का रोट चढ़ाया जाता है। रोट चढ़ाने से भगवान सिद्धबली प्रसन्न होते हैं।


जागर में कही जाती है कथा
- सिद्धबली मंदिर में जब जागर लगाए जाते हैं तो उसमें इस कथा का विस्तार से वर्णन किया जाता है। इसे सिद्धबाबा के जागर भी कहते हैं। मंदिर मेंथ सुदाय का विशेष महत्व होता है। सिद्धबली गोरखनाथ का शिष्य होने के चलते नाथ मेंथ समुदाय के लोग महोत्सव में बड़ी संख्या में शिरकत करते हैं। सिद्धबली के महंत दिलीप रावत के अनुसार स्कंद पुराण के अध्याय 119 के (छठे श्लोक) में इसका वर्णन किया गया है।

महोत्सव के पहले दिन के कार्यक्रम
- पिंडी महाभिषेक पांच बजे सुबह
- मंदिर परिक्रमा और ध्वज पूजा सात बजे सुबह।
- एकादश कुंडीय यज्ञ सात बजे सुबह।
- सुंदर कांड दस बजे सुबह।
- भव्य शोभायात्रा का शुभारंभ सायं तीन बजे।
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