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भगवान कमलेश्वर महादेव को चढ़ाए 101 कमल पुष्प
श्रीनगर
Updated Mon, 15 Feb 2016 10:34 PM IST
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भगवान कमलेश्वर महादेव का 101 कमल पुष्प चढ़ा घृत कमल पूजा अनुष्ठान किया गया। महंत ने दिगंबर वेश में जमीन पर लोटकर कमलेश्वर महादेव की आराधना कर विश्व कल्याण की कामना की।
रविवार रात कमलेश्वर महादेव मंदिर में घृत कमल अनुष्ठान किया गया। यह अनुष्ठान प्रत्येक वर्ष माघ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को कमलेश्वर महादेव मंदिर में अनुष्ठान किया जाता है। परंपरानुसार पंडित दुर्गा प्रसाद बमराड़ा ने महंत आशुतोष पुरी के हाथों शाम आठ बजे से शिव की पूजा शुरू कराई। इसमें भगवान शिव की तीन बार सांग-पांग पूजा (पूजा की विधि) संपन्न हुई। पूजा के पश्चात भगवान को 101 कमल पुष्प अर्पित किए गए। साथ ही 52 प्रकार के व्यंजन और 56 भोग लगाए गए। इस पूरी प्रक्रिया के बाद रात लगभग 11 बजे महंत ने दिगंबर अवस्था में मंदिर में चारों ओर जमीन में लोटते हुए शिव की पूजा संपन्न की। इस अवसर पर अपर आयुक्त गढ़वाल हरक सिंह रावत, पालिकाध्यक्ष विपिन चंद्र मैठानी, पूर्व अध्यक्ष कृष्णानंद मैठाणी, मुकेश चमोली, उदित घिल्डियाल, गोवर्द्धन गिरि, भवनेश गोदियाल, प्रकाश चंद्र खंकरियाल, अरविंद थपलियाल आदि मौजूद थे।
यह है मान्यता
तारकासुर नामक राक्षस ने भगवान ब्रह्मा की तपस्या कर शिव पुत्र से अपने वध का वरदान मांगा था। यह मांगने का कारण यह था कि भगवान शिव की पहली पत्नी सती द्वारा यज्ञकुंड में अपनी प्राणों की आहुति देने के बाद वह दुखी होकर ध्यान में लीन हो गए थे। तारकासुर का यह विश्वास था कि भगवान शिव का जब विवाह ही नहीं होगा, तो पुत्र कहां से होगा। यदि पुत्र नहीं होगा, तो उसका वध भी नहीं होगा। इसी अहंकार में वह अत्याचार करने लगा। दैत्य के आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए शिव के दूसरा विवाह जरूरी था। देवताओं ने कमलेश्वर में ही पूजा की थी। प्राचीनकाल से चली आ रही परंपरा को अब मंदिर के महंत निभाते हैं।
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रविवार रात कमलेश्वर महादेव मंदिर में घृत कमल अनुष्ठान किया गया। यह अनुष्ठान प्रत्येक वर्ष माघ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को कमलेश्वर महादेव मंदिर में अनुष्ठान किया जाता है। परंपरानुसार पंडित दुर्गा प्रसाद बमराड़ा ने महंत आशुतोष पुरी के हाथों शाम आठ बजे से शिव की पूजा शुरू कराई। इसमें भगवान शिव की तीन बार सांग-पांग पूजा (पूजा की विधि) संपन्न हुई। पूजा के पश्चात भगवान को 101 कमल पुष्प अर्पित किए गए। साथ ही 52 प्रकार के व्यंजन और 56 भोग लगाए गए। इस पूरी प्रक्रिया के बाद रात लगभग 11 बजे महंत ने दिगंबर अवस्था में मंदिर में चारों ओर जमीन में लोटते हुए शिव की पूजा संपन्न की। इस अवसर पर अपर आयुक्त गढ़वाल हरक सिंह रावत, पालिकाध्यक्ष विपिन चंद्र मैठानी, पूर्व अध्यक्ष कृष्णानंद मैठाणी, मुकेश चमोली, उदित घिल्डियाल, गोवर्द्धन गिरि, भवनेश गोदियाल, प्रकाश चंद्र खंकरियाल, अरविंद थपलियाल आदि मौजूद थे।
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यह है मान्यता
तारकासुर नामक राक्षस ने भगवान ब्रह्मा की तपस्या कर शिव पुत्र से अपने वध का वरदान मांगा था। यह मांगने का कारण यह था कि भगवान शिव की पहली पत्नी सती द्वारा यज्ञकुंड में अपनी प्राणों की आहुति देने के बाद वह दुखी होकर ध्यान में लीन हो गए थे। तारकासुर का यह विश्वास था कि भगवान शिव का जब विवाह ही नहीं होगा, तो पुत्र कहां से होगा। यदि पुत्र नहीं होगा, तो उसका वध भी नहीं होगा। इसी अहंकार में वह अत्याचार करने लगा। दैत्य के आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए शिव के दूसरा विवाह जरूरी था। देवताओं ने कमलेश्वर में ही पूजा की थी। प्राचीनकाल से चली आ रही परंपरा को अब मंदिर के महंत निभाते हैं।
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