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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Haridwar News ›   Shiva and Parvati, the signs are dispersed in Haridwar

हरिद्वार में बिखरे हैं शिव पार्वती के चिन्ह

Fri, 22 Jul 2016 11:47 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला रुड़की
ब्यूरो/अमर उजाला रुड़की Updated Fri, 22 Jul 2016 11:47 PM IST
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हरिद्वार। हरिद्वार और कनखल में भगवान शंकर, सती और पार्वती के अनेक चिन्ह बिखरे हुए हैं। सभी स्थानों पर मंदिर बन चुके हैं और भक्त शिव का ध्यान करने के लिए पूरे श्रावण मास इन पौराणिक मंदिरों में अभिषेक करने पहुंचे हैं।

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राजा दक्ष की पुत्री सती का जन्म जिस कनखल में हुआ था, उस नगरी में कण-कण में शिव निवास करते हैं। प्रसिद्ध दक्षेश्वर मंदिर तो शिव का धाम है। अन्य मंदिरों में भी शिव की आराधना उनके स्वरूपों के आधार पर होती है। कनखल का तिलभांडेश्वर मंदिर सती की भ्रमण भूमि रहा है। इस मंदिर में विशाल शिवलिंग हैं। इसके बारे में धारणा है कि यह लिंग शुक्ल पक्ष में तिलतिल बढ़ता है और कृष्ण पक्ष में तिलतिल घटता है। श्रद्धालु शिवलिंग की पूजा यज्ञोपवीत पहनाकर करते हैं। इस मंदिर के पास ही भगवान शंकर के दुख भंजन और दरिद्र भंजन स्वरूपों के मंदिर बनाए गए हैं। इन मंदिरों में जलाभिषेक से दुख और दरिद्रता मिट जाती है। कनखल के वर्तमान बाजार में वह स्थान है, जहां भोलेनाथ की बारात ठहरी थी। उस मंदिर को जनवासा मंदिर नाम दिया गया है। कनखल के पास जगजीतपुर में विशाल सतीकुंड विद्यमान है। यह वह स्थल है, जहां 84 हजार देवों और ऋषियों ने राजा दक्ष को यज्ञ कराया था। इसी कुंड में सती ने अपनी देह दग्ध की थी।
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लील पर्वत स्थित वर्तमान नीलेश्वर मंदिर में ंऊंचा शिवलिंग विराजमान है। बिल्व पर्वत पर वर्तमान बिल्वकेश्वर मंदिर वही स्थल है, जहां समीपवर्ती गौरी कुंड में बैठकर शिव को पाने के लिए पार्वती ने तपस्या की थी। बाद में जब दोनों का मिलन हुआ, तब वह नील पर्वत की तलहटी में स्थित वन क्षेत्र पहुंचे। आज वहां गौरी और शंकर का एक मंदिर है। इस मंदिर का शिवलिंग श्वेत रंग का है। शिव ने बाद में सती की जिस देह को कंधों पर लेकर तांडव किया, वह देह वर्तमान मायापुरी के मायादेवी मंदिर में रखी गई थी। कालांतर में इस देह के टूटकर गिरने से भारत वर्ष में द्वादश ज्योर्तिलिंगों की स्थापना हुई। पुण्य भूमि प पूरे श्रावण मास सती और शिव के बिखरे चिन्हों पर बने मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगी रहती है।

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