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झोड़ा, चांचरी, छपेली को देंगे नया लुक
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, चंपावत।
Updated Sat, 26 Mar 2016 10:35 PM IST
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लोकगायक सुरेश राजन
- फोटो : अमर उजाला
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चंपावत। प्रसिद्ध कुमाऊंनी लोकगायक सुरेश राजन काली कुमाऊं की विराट सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में जुटे हैं। अब वह पर्वतीय अंचल में लुप्त हो रही झोड़ा, चांचरी, छपेली को नया लुक देंगे। इसके लिए वह अपने पुत्र और इंडिया वॉयस प्रतियोगिता के पहले विजेता पवनदीप राजन संग जुगलबंदी करेंगे।
वर्ष 1999 में चंपावत जिला मुख्यालय में सुर संगम कला केंद्र की स्थापना करने वाले सुरेश राजन की दो दर्जन से अधिक ऑडियो, वीडियो कैसेट बाजारों में धूम मचा रही हैं। यही नहीं वह कई टेलीफिल्मों में अपना स्वर दे चुके हैं। वह सुर संगम कला केंद्र के जरिए कुमाऊंनी लोक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने में जुटे हैं।
राज्य सरकार के संस्कृति विभाग की ओर से गुरु शिष्य परंपरा के तहत तीन साल पहले उन्हें गुरु भी नियुक्त किया गया था। जिसमें उन्होंने छह माह के भीतर दस शिष्यों को गायन के साथ ही विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों को बजाने का प्रशिक्षण दिया है।
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सुरेश राजन का कहना है कि अब वह अपने बेटे पवन के साथ कुमाऊं की पुरातन सांस्कृतिक विरासत को सहेजेंगे। जिसके तहत सुरेश और पवन की जोड़ी फिल्मी गीतों और संगीत में अब कुमाऊं के झोड़ा, चांचरी, छपेली न्यौली आदि विधाओं को शामिल करेगी। इसके लिए पवनदीप ने गायक शान से बातचीत की है।
लोहाघाट (चंपावत)। लोक संस्कृति और लोक परंपरा को संरक्षित करने की दिशा में कुमाऊं लोक सांस्कृतिक कला दर्पण की ओर से लगातार प्रयास किए जाते रहे हैं। इस दल का गठन वर्ष 1998 में किया गया था। तब से लगातार इस दल के कलाकार राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय मंचों में लोकगीत, लोकनृत्य, झोड़ा, चांचरी, न्यौली, लोक कथा, लोक गाथाओं का मंचन कर जिले और राज्य का नाम रोशन करते आ रहे हैं। कला दर्पण के दल नायक भैरव दत्त राय हिमालय कलाकार कल्याण महासंघ उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं।
दल के कलाकार छह वर्षों से लगातार पंजाब, ओडिशा, राजस्थान, असोम, रायपुर, मैंगलूर में आयोजित राष्ट्रीय युवा महोत्सव में राज्य की टीम का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इस दल को संस्कृति निदेशालय देहरादून, गीत नाट्य प्रभाग भारत सरकार और सूचना लोक संपर्क विभाग से मान्यता मिली है। राष्ट्रीय कार्यक्रम शिक्षा के अधिकार की जानकारी देने के लिए ज्योति, सूचना के अधिकार की जानकारी के लिए ‘एक नई सुबह’ लघु फिल्म के निर्माण दल के कलाकारों ने अहम भूमिका निभाई।
बनबसा (चंपावत)। ‘चेली’ और ‘सिपैजी’ नामक कुमाऊंनी फिल्म में विलेन का रोल निभाने वाले रंगमंच कर्मी और कुमाऊंनी फिल्म कलाकार जसवंत सिंह बसेड़ा का कहना है कि सरकार रंगमंचों के प्रति उदासीन है। उन्होंने कहा कि रंगमंच ऐसी विधा है जिसका सीधा असर दर्शकों के मन मस्तिष्क पर पड़ता है। कभी राजा, महाराजा, शिक्षक समाज को सुधारने, दिशा देने और नियमों में बांधने को रंगमंचों का सहारा लेते थे लेकिन अब रंगमंचों पर फिल्में हावी हो गई हैं। समाज को दिशा देने में फिल्म भी अच्छा काम कर सकती थीं लेकिन फिल्मकारों ने इस विधा को पैसे कमाने का साधन बना लिया है।
बनबसा (चंपावत)। यंग बाइकर्स नामक फिल्म में खलनायक की भूमिका निभाने वाले कलाकार उत्तम चंद का कहना है कि रंगमंच की विधा को फिल्मी पर्दे की चमक ने चोट पहुंचाई है। समाज को दिशा देने वाली दो बीधा जमीन, काबुली वाला, अनुराधा, सीमा, हकीकत, मुगल-ए-आजम जैसी ऐतिहासिक फिल्में अब नहीं दिखाई देती हैं। सरकार को चाहिए कि रंगमंचों को बढ़ावा दिया जाए। उत्तराखंड में भी कभी रंगमंच लोक संस्कृतियों के संरक्षण को प्रचार प्रसार का माध्यम था लेकिन सरकार ने रंगमंच को बढ़ावा देने की ओर कुछ खास नहीं किया है।
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वर्ष 1999 में चंपावत जिला मुख्यालय में सुर संगम कला केंद्र की स्थापना करने वाले सुरेश राजन की दो दर्जन से अधिक ऑडियो, वीडियो कैसेट बाजारों में धूम मचा रही हैं। यही नहीं वह कई टेलीफिल्मों में अपना स्वर दे चुके हैं। वह सुर संगम कला केंद्र के जरिए कुमाऊंनी लोक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने में जुटे हैं।
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राज्य सरकार के संस्कृति विभाग की ओर से गुरु शिष्य परंपरा के तहत तीन साल पहले उन्हें गुरु भी नियुक्त किया गया था। जिसमें उन्होंने छह माह के भीतर दस शिष्यों को गायन के साथ ही विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों को बजाने का प्रशिक्षण दिया है।
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सुरेश राजन का कहना है कि अब वह अपने बेटे पवन के साथ कुमाऊं की पुरातन सांस्कृतिक विरासत को सहेजेंगे। जिसके तहत सुरेश और पवन की जोड़ी फिल्मी गीतों और संगीत में अब कुमाऊं के झोड़ा, चांचरी, छपेली न्यौली आदि विधाओं को शामिल करेगी। इसके लिए पवनदीप ने गायक शान से बातचीत की है।
लोहाघाट (चंपावत)। लोक संस्कृति और लोक परंपरा को संरक्षित करने की दिशा में कुमाऊं लोक सांस्कृतिक कला दर्पण की ओर से लगातार प्रयास किए जाते रहे हैं। इस दल का गठन वर्ष 1998 में किया गया था। तब से लगातार इस दल के कलाकार राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय मंचों में लोकगीत, लोकनृत्य, झोड़ा, चांचरी, न्यौली, लोक कथा, लोक गाथाओं का मंचन कर जिले और राज्य का नाम रोशन करते आ रहे हैं। कला दर्पण के दल नायक भैरव दत्त राय हिमालय कलाकार कल्याण महासंघ उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं।
दल के कलाकार छह वर्षों से लगातार पंजाब, ओडिशा, राजस्थान, असोम, रायपुर, मैंगलूर में आयोजित राष्ट्रीय युवा महोत्सव में राज्य की टीम का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इस दल को संस्कृति निदेशालय देहरादून, गीत नाट्य प्रभाग भारत सरकार और सूचना लोक संपर्क विभाग से मान्यता मिली है। राष्ट्रीय कार्यक्रम शिक्षा के अधिकार की जानकारी देने के लिए ज्योति, सूचना के अधिकार की जानकारी के लिए ‘एक नई सुबह’ लघु फिल्म के निर्माण दल के कलाकारों ने अहम भूमिका निभाई।
बनबसा (चंपावत)। ‘चेली’ और ‘सिपैजी’ नामक कुमाऊंनी फिल्म में विलेन का रोल निभाने वाले रंगमंच कर्मी और कुमाऊंनी फिल्म कलाकार जसवंत सिंह बसेड़ा का कहना है कि सरकार रंगमंचों के प्रति उदासीन है। उन्होंने कहा कि रंगमंच ऐसी विधा है जिसका सीधा असर दर्शकों के मन मस्तिष्क पर पड़ता है। कभी राजा, महाराजा, शिक्षक समाज को सुधारने, दिशा देने और नियमों में बांधने को रंगमंचों का सहारा लेते थे लेकिन अब रंगमंचों पर फिल्में हावी हो गई हैं। समाज को दिशा देने में फिल्म भी अच्छा काम कर सकती थीं लेकिन फिल्मकारों ने इस विधा को पैसे कमाने का साधन बना लिया है।
बनबसा (चंपावत)। यंग बाइकर्स नामक फिल्म में खलनायक की भूमिका निभाने वाले कलाकार उत्तम चंद का कहना है कि रंगमंच की विधा को फिल्मी पर्दे की चमक ने चोट पहुंचाई है। समाज को दिशा देने वाली दो बीधा जमीन, काबुली वाला, अनुराधा, सीमा, हकीकत, मुगल-ए-आजम जैसी ऐतिहासिक फिल्में अब नहीं दिखाई देती हैं। सरकार को चाहिए कि रंगमंचों को बढ़ावा दिया जाए। उत्तराखंड में भी कभी रंगमंच लोक संस्कृतियों के संरक्षण को प्रचार प्रसार का माध्यम था लेकिन सरकार ने रंगमंच को बढ़ावा देने की ओर कुछ खास नहीं किया है।