Champawat: मैली हो गई लोहावती, चार दशक पहले नदी में पहला स्नान कर आगे बढ़ते थे कैलाश मानसरोवर यात्री
लोहाघाट नगर की जीवदायिनी लोहावती नदी का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। जगह-जगह गंदगी पटने से इसका जल पीने के लायक तो दूर स्नान के लायक भी नहीं रहा।
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लोहाघाट नगर की जीवदायिनी लोहावती नदी का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। जगह-जगह गंदगी पटने से इसका जल पीने के लायक तो दूर स्नान के लायक भी नहीं रहा। चार दशक पहले जब कैलाश यात्री यहां से होकर गुजरते थे तो उनका पहला स्नान इसी नदी में होता था। आज नदी एक नाले में तब्दील हो गई है। लोगों की नासमझी और अनदेखी के चलते इसका स्वरूप बदलता जा रहा है।पांच किमी के दायरे में नदी जगह-जगह दूषित हो गई है। फोर्ती, लोहाघाट नगर क्षेत्र के लोगों का शमशान घाट भी इस पर है। नगर से डेढ़ किमी दूर इस नदी से चौड़ी लिफ्ट पेयजल योजना बनी है। इस योजना से करीब 11 हजार की आबादी को पानी की आपूर्ति की जाती है। ऐसे में दूषित होते इसके पानी से रोगों का खतरा बढ़ गया है।
पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व वाली लोहावती नदी की साफ-सफाई के लिए अभियान चलाया जाएगा। नीतू डांगर, एसडीएम, लोहाघाट
इन स्थानों पर नदी में गिरती है सबसे अधिक गंदगी
नदी में सबसे अधिक गंदगी कोलीढेक पुल, हिटलर मार्केट, पिथौरागढ़ रोड, स्टेशन बाजार, पेट्रोल पंप और बाड़ी गाड़ के नालों से गिरती है।
कोलीढेक झील बनने के बाद कम हो गया नदी में पानी
लोहावती नदी से थुवा माहरा, झलानदेव, फोर्ती, कोलीढेक, रायनगर चौड़ी आदि गांव जुड़े हैं। नदी पर कोलीढेक झील बनने के बाद यहां पानी की कमी होने से यह नाले का रूप ले चुकी है। बरसात में झील को खोलने के बाद लोहावती में पानी बढ़ जाता है। आबादी बढ़ने, संरक्षण-स्वच्छता न होने से नदी प्रदूषित होती चली गई। शिवालय मंदिर के आसपास नदी में कई संगठन कभी- कभार स्वच्छता अभियान चला देते हैं, जो नाकाफी है। बारिश के दौरान भी नगर और ग्रामीण क्षेत्रों से कूड़ा-कचरा बहकर इसके जल को प्रदूषित कर रहा है।
इन गधेरों का पानी मिलता है लोहावती में
थुवा माहरा, झलानदेव, बिशंग भालूखोला, सिनगाड़, पाटन और मायावती गधेरे से आने वाले पानी से मिलकर बनने वाली लोहावती नदी नगर सहित आसपास के लोगों की प्यास बुझाती थी। धीरे-धीरे इन गधेरों में भी पानी कम हो गया।
लोहावती के संरक्षण के लिए अभियान चला रही हूं। मेरा मकसद इस पौराणिक एवं ऐतिहासिक नदी को उसके पूर्व स्वरूप में लाना है। वर्षों पूर्व इसके जल से ऋषेश्वर मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक होता था। अब नदी का जल इतना प्रदूषित हो गया है कि लोग इसमें हाथ लगाने से भी कतराते हैं। इसके संरक्षण के लिए सभी को आगे आने की जरूरत है। - रीता गहतोड़ी, अध्यक्ष स्वागतम ईजा संस्था, लोहाघाट
लोहावती नदी हमारा पोषण करते-करते स्वयं अपना अस्तित्व खो रही है। कहीं न कहीं इसके प्रदूषण के जिम्मेदार स्वयं हम भी हैं। अब समय आ गया है अपने स्तर से इसके संरक्षण और स्वच्छता के लिए आगे आएं। करीब चार दशक पूर्व यही नदी कैलाश यात्रियों की प्रथम स्नान की साक्षी हुआ करती थी। आज हम आचमन करने के लिए भी तरस गए हैं। हितेश मुरारी, पर्यावरण प्रेमी, लोहाघाट