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पहाड़ पर बन रहे पॉलिथीन के ढेर
ब्यूरो/अमर उजाला, चंपावत
Updated Wed, 10 Feb 2016 10:28 PM IST
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प्रतिबंध के बावजूद अपना हरा-भरा पहाड़ पॉलिथीन के ढेर में तब्दील होता जा रहा है। चंपावत में भी पॉलिथीन प्रतिबंधित है, लेकिन जमीन पर यह रोकटोक कहीं नजर नहीं आती। नतीजतन कूड़े के ढेरों में सबसे ज्यादा मात्रा भी पॉलिथीन की है और नगर पालिका तथा प्रशासन पॉलिथीन पर लगाम के नाम पर चंद चालान कर जिम्मेदारी पूरी मान लेता है।
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20 माइक्रोन से कम की पॉलिथीन का उपयोग प्रतिबंधित है, लेकिन फिर भी यहां न दुकानों से पॉलिथीन गायब है और नहीं लोगों के हाथों से यह छूट रही है। ज्यादातर दुकानों में पॉलिथीन का इस्तेमाल न रुका है और न कम हुआ है। बस इतना भर हुआ कि ग्राहक को पॉलिथीन देते वक्त नहीं पकड़े जाने के लिए सावधानी जरूर बरती जाती है। जिलेभर में औसतन करीब एक क्विंटल पॉलिथीन का कचरा रोजाना निकल रहा है, जो अलग-अलग जगह कूड़े के ढेरों में बिखरा पड़ा रहता है। पॉलिथीन के उपयोग को रोकने के लिए कानूनी प्रावधान बेअसर हो रहे हैं।
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कार्रवाई के नाम पर 2014 से अब तक महज 21 लोगों के चालान हुए हैं और 21 हजार रुपये का जुर्माना वसूला जा सका है। इनमें सबसे बेहतर स्थिति टनकपुर नगर पालिका की है। एनएच पर ही जिला अस्पताल के पास से लेकर जीआईसी तिराहे तक में तीन कूड़े के ढेरों में पॉलिथीन बिखरी पड़ी है।
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1998 में पॉलिथीन फ्री जिला बना था चंपावत
सितंबर 1997 में जिला बनने के छह माह बाद मार्च 1998 में चंपावत स्वत: स्फूर्त पॉलिथीन फ्री जिला बना। तब इस पर न कोई प्रतिबंध था न ऐसा कोई नियम-कानून, मगर तत्कालीन जिलाधिकारी नवीन चंद्र शर्मा की पहल से प्रेरित होकर लोगों ने इसे दिल से माना। यहां तक कि मां पूर्णागिरि धाम मेले में भी बाहर से आने वाले तीर्थयात्री यहां की इस पहल से गदगद थे।
बेकार हो रही कांपेक्टर मशीन
पॉलिथीन और प्लास्टिक की रिसाइक्लिंग के लिए 2014 में चंपावत में कांपेक्टर (पॉलिथीन रिसाइकिल) मशीन लगी। इस मशीन के जरिए बेकार पड़ी पॉलिथीन के छोटे-छोटे ब्रिक्स बनने थे। एक समय में 40 टन पॉलिथीन को रिसाइकिल कर 4 टन पॉलिथीन में तब्दील किया जाना था। इससे नगर पालिका की मासिक आय में इजाफा होने के साथ किसानों को जैविक खाद भी मिलती। मगर यह मशीन भी कारगर साबित नहीं हुई।
जेब में झोला लेकर चलते हैं वर्मा जी
पॉलिथीन के बेतहाशा इस्तेमाल के बीच कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो मानते हैं कि पॉलिथीन का इस्तेमाल गलत है, इनमें से एक हैं जड़ी-बूटी भेषज संघ के जिला समन्वय राकेश वर्मा जी। साक-भाजी ही नहीं, दूध जैसी छोटी सामग्री के लिए भी जेब में झोला लेकर चलते हैं। पॉलिथीन देने वाले को झिड़कते भी है। उनका कहना है कि इसके लिए कानून से ज्यादा जागरूकता जरूरी है।