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स्वर्ण मंदिर की राह पर श्रीरीठा साहिब का गुरुद्वारा
चंद्रशेखर जोशी/हयात राम, चंपावत
Updated Thu, 16 Jun 2016 10:45 PM IST
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स्वर्ण मंदिर की राह पर श्रीरीठा साहिब का गुरुद्वारा
- फोटो : अमर उजाला
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मीठे रीठे के लिए दुनियाभर में मशहूर श्रीरीठा साहिब गुरुद्वारे में अब भव्यता की मिठास भी घुलेगी। जल्द ही सोने का दरवाजा इस पवित्र गुरुद्वारे की शान बनेगा। दरवाजे को लगाने के लिए कारीगर यहां पहुंच गए हैं। 20 जून को होने वाली पूर्णमासी को ये दरवाजा लग जाएगा। दुनियाभर में फैले श्रद्धालुओं ने मिलकर इस दरवाजे को बनवाया है।
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इस बार की ज्येष्ठ माह की पूर्णमासी (20 जून) को आध्यात्मिक रस घोलने वाले श्रीरीठा साहिब के गुरुद्वारे के इतिहास में मील का पत्थर होगी। सिख धर्म के संस्थापक गुरुनानक देव के चरण स्पर्श होने से अध्यात्मिक की अविरल गंगा बहाने वाले इस गुरुद्वारे में इस दिन यहां सोने का खूबसूरत दरवाजा लग जाएगा। नानकमत्ता गुरुद्वारे के बाबा तरसेम सिंह ने बताया कि सोने का यह दरवाजा सबसे पवित्र स्थल दरबारा साहिब में लगेगा। दरवाजे का भीतरी हिस्सा तांबे का है, जबकि बाहर से सोने की पॉलिश की गई है।
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चंपावत गुरुद्वारे के प्रबंधक बाबा श्याम सिंह ने बताया कि सात फीट लंबाई और छह फीट चौड़ाई वाले इस दरवाजे के लिए श्रद्धालुओं से सोना एकत्र करने से लेकर बनाने तक में करीब एक साल का समय लगा है। दरवाजे की कीमत 1.50 करोड़ रुपये से अधिक की है। पांच किलोग्राम सोने का यह दरवाजा कनाडा, केन्या, ब्रिटेन के अलावा दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उप्र आदि के सैकड़ों भक्तों के सहयोग से बनाया गया है। आस्था के अलावा गुरुद्वारे को खूबसूरत बनाने के मकसद से इस स्वर्णिम दरवाजे को भेंट किया गया है। इस दरवाजे को लगाने के लिए कारीगरों की टीम यहां पहुंच चुकी है।
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सोने की पालकी में रखा है गुरुग्रंथ साहिब
श्रीरीठा साहिब के गुरुद्वारे में इससे पूर्व चार पवित्र सामग्री में सोने का उपयोग किया जा चुका है। गुरुद्वारे के गुंबद में करीब चार साल पहले सोने का कलश लगाया गया है। इस कलश में दो किलोग्राम सोना लगा है। इसी तरह गुरुद्वारे में सोने की पालकी भी है। इस पालकी में सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ गुरुग्रंथ साहिब को रखा जाता है। श्रीरीठा साहिब की सोने की तस्वीर, जिसमें गुरु नानक देव, दो शिष्य मरदाना व बालाजी, रीठा के पेड़ की तस्वीर है। गुरुद्वारे के प्रतीक चिन्ह निशान साहिब का खंभे में भी सोना लग चुका है।राष्ट्रपति रहे ज्ञानी जैल सिंह देश के गृह मंत्री के रूप में 1981 में श्रीरीठा साहिब गुरुद्वारे में मत्था टेक चुके हैं। जबकि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद 2002 में राज्यपाल रहते सुरजीत सिंह बरनाला ने गुरुद्वारे में शीश नवाए।
अध्यात्म से मजबूत हो रहा आधारभूत ढांचा
श्रीरीठा साहिब के गुरुद्वारे ने आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दिशा ही नहीं दी, बल्कि धार्मिक पर्यटन की बुनियाद को भी मजबूत किया। इस इलाके के विकास में इस गुरुद्वारे का अहम रोल है। तीन दशक पहले यहां तक सड़क पहुंची। पुलिस थाना है। मोबाइल सेवा है और अब हेलीपेड के लिए जमीन की तलाश की जा रही है।
भक्तों को मिलता है मीठे रीठे का प्रसाद
श्रीरीठा साहिब में भक्तों को प्रसाद के रूप में मीठा रीठा दिया जाता है। इसके लिए परिसर में ढेरों रीठे के पेड़ भी लगाए गए हैं। कड़वे से मीठे बने ये रीठे गुरुनानक की आध्यात्मिक चमत्कार को दुनियाभर में बताते हैं। गुरु नानकजी अपने दो सेवक मरदाना व बालाजी के साथ करीब 350 साल पहले नानकमत्ता होते हुए श्रीरीठा साहिब आए थे।