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रोपवे तो बना दिए पर चलवा नहीं पा रहे
ब्यूरो/अमर उजाला, चंपावत
Updated Sat, 06 Aug 2016 10:34 PM IST
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रोपवे तो बना दिए पर चलवा नहीं पा रहे
- फोटो : अमर उजाला
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सड़क से कटे कई गांवों के काश्तकारों को रोपवे के निर्माण के बाद आस जगी थी कि गांव तक रोड नहीं होने के बावजूद खेतों में की गई उनकी मेहनत बेकार नहीं जाएगी, लेकिन उनकी ये उम्मीद रोपवे बनने के बाद भी धराशायी है। निर्माण के बाद रोपवे कभी चल नहीं सके और इस वक्त भी जंक खा रहे हैं।
क्वैराला घाटी से लगे 20 से ज्यादा गांव फल उत्पादन में आगे हैं। लेकिन इन काश्तकारों की उपज को सीधे बाजार अथवा सड़क मार्ग तक पहुंचाने के मकसद से तीन स्थानों में रोपवे का निर्माण किया गया था। सर्वे के बाद सैंदर्क और अमकड़िया गांवों के बीच सात लाख रुपये में 900 मीटर लंबे रोपवे को बनाया गया। वहीं 6 लाख रुपये में सिमाड़ से पुनाबे, दियूरी बैंड से मटेला तक रोपवे का निर्माण हुआ। इन रोपवे में 90 किलोग्राम क्षमता तक की सामग्री लाई जा सकती थी। 2006 तक निर्माण भी पूरा हुआ, मगर कुछ ही दिनों में बिना माल ढोए ये रोपवे जवाब दे गए।
रोपवे ने काम करना बंद कर दिया। अब भी रोपवे में ट्राली टूटने, तार की खामी के अलावा जनरेटर भी खराब है। ग्रामीणों का कहना है कि रोपवे की ट्राली, रखरखाव सहित दूसरी खामियों को दूर करने के लिए कई बार आग्रह किया जा चुका है। लेकिन उसने हर बार पीठ फेरी। विभाग की हीलाहवाली से रोपवे का लाभ नहीं मिल रहा है और लोगों को फसल का वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा है।
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ढुलान से पानी होती है मेहनत
अमकड़िया, मारामट्टा, बुड़ाखेत, भंतोला, गवाड़,, सिमाड़ सहित यहां के ज्यादातर रोडविहीन गांवों की मिट्टी सोना उगलती है। इन गांवों में केला, पपीता, अमरूद, आम, संतरा सहित फलों का बहुतायत में उत्पादन होता है। बीडीसी सदस्य घनश्याम भट्ट, प्रकाश जोशी आदि ग्रामीणों का कहना है कि खच्चर से ढुलान में प्रति कुंतल 300 से 400 रुपये लगता है। जबकि रोपवे से ये लागत सिर्फ 30 से 50 रुपये तक होती। पर रोपवे के काम नहीं करने से कोई लाभ नहीं मिल रहा है। कंधा ढुलान के चलते उनकी सारी मेहनत उपज को सड़क तक पहुंचाने में लग जाती है। अब यहां के लोग इस मसले को विधानसभा चुनाव में उठाने की बात कह रहे हैं।
तीनों रोपवे को निर्माण के बाद ग्राम पंचायत को हस्तांतरित किया गया था। इसे संचालित करने से लेकर देखरेख का जिम्मा उसी का है। इसके लिए किराया वसूलने का हक भी इन्हीं पंचायतों को दिया गया था। रखरखाव और खराबी होने पर इसे ठीक भी पंचायत को ही करना था। विभाग के पास रखरखाव मद में धन नहीं है।
-एचसी तिवारी, जिला उद्यान अधिकारी, चंपावत।
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क्वैराला घाटी से लगे 20 से ज्यादा गांव फल उत्पादन में आगे हैं। लेकिन इन काश्तकारों की उपज को सीधे बाजार अथवा सड़क मार्ग तक पहुंचाने के मकसद से तीन स्थानों में रोपवे का निर्माण किया गया था। सर्वे के बाद सैंदर्क और अमकड़िया गांवों के बीच सात लाख रुपये में 900 मीटर लंबे रोपवे को बनाया गया। वहीं 6 लाख रुपये में सिमाड़ से पुनाबे, दियूरी बैंड से मटेला तक रोपवे का निर्माण हुआ। इन रोपवे में 90 किलोग्राम क्षमता तक की सामग्री लाई जा सकती थी। 2006 तक निर्माण भी पूरा हुआ, मगर कुछ ही दिनों में बिना माल ढोए ये रोपवे जवाब दे गए।
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रोपवे ने काम करना बंद कर दिया। अब भी रोपवे में ट्राली टूटने, तार की खामी के अलावा जनरेटर भी खराब है। ग्रामीणों का कहना है कि रोपवे की ट्राली, रखरखाव सहित दूसरी खामियों को दूर करने के लिए कई बार आग्रह किया जा चुका है। लेकिन उसने हर बार पीठ फेरी। विभाग की हीलाहवाली से रोपवे का लाभ नहीं मिल रहा है और लोगों को फसल का वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा है।
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ढुलान से पानी होती है मेहनत
अमकड़िया, मारामट्टा, बुड़ाखेत, भंतोला, गवाड़,, सिमाड़ सहित यहां के ज्यादातर रोडविहीन गांवों की मिट्टी सोना उगलती है। इन गांवों में केला, पपीता, अमरूद, आम, संतरा सहित फलों का बहुतायत में उत्पादन होता है। बीडीसी सदस्य घनश्याम भट्ट, प्रकाश जोशी आदि ग्रामीणों का कहना है कि खच्चर से ढुलान में प्रति कुंतल 300 से 400 रुपये लगता है। जबकि रोपवे से ये लागत सिर्फ 30 से 50 रुपये तक होती। पर रोपवे के काम नहीं करने से कोई लाभ नहीं मिल रहा है। कंधा ढुलान के चलते उनकी सारी मेहनत उपज को सड़क तक पहुंचाने में लग जाती है। अब यहां के लोग इस मसले को विधानसभा चुनाव में उठाने की बात कह रहे हैं।
तीनों रोपवे को निर्माण के बाद ग्राम पंचायत को हस्तांतरित किया गया था। इसे संचालित करने से लेकर देखरेख का जिम्मा उसी का है। इसके लिए किराया वसूलने का हक भी इन्हीं पंचायतों को दिया गया था। रखरखाव और खराबी होने पर इसे ठीक भी पंचायत को ही करना था। विभाग के पास रखरखाव मद में धन नहीं है।
-एचसी तिवारी, जिला उद्यान अधिकारी, चंपावत।