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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Champawat News ›   Feature so far, not even pension on time

सुविधा तो दूर, वक्त पर पेंशन भी नहीं

Wed, 02 Dec 2015 10:05 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंपावत
ब्यूरो/अमर उजाला, चंपावत Updated Wed, 02 Dec 2015 10:05 PM IST
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विकलांगों के कल्याण के दावे बेशुमार हो रहे हैं, मगर हालात बता रहे हैं कि उनकी अनदेखी हो रही है। विकलांगों को जरूरी सुविधाएं तो दूर, पेंशन को भी तरसना पड़ रहा है। चंपावत जिले में विकलांगों को पांच महीनों से विकलांग पेंशन और तीलू रौतेली विकलांग पेंशन तक नहीं मिल सकी है।

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3000 से अधिक विकलांगों वाले इस जिले में उनके लिए सुविधा शून्य है। पेंशन को तो वे तरस ही रहे हैं। यहां तक कि एक भी विकलांग छात्रावास नहीं है और न ही अन्य कोई सुविधाएं। पेंशन की पात्रता वाले विकलांगों की तादात मात्र 1864 है। जिला समाज कल्याण अधिकारी पीसी जोशी के मुताबिक 2014-15 में विकलांग पेंशन के रूप में 1.56 करोड़ रुपये बांटे गए, मगर मौजूदा वित्त वर्ष में अभी जून तक ही पेंशन दी जा सकी है। विकलांग पेंशन में 1815 लोगों के अलावा तीलू रौतेली के तहत 49 लोग पेंशन के लिए पात्र हैं।
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तीलू रौतेली में 20 प्रतिशत से 40 प्रतिशत विकलांगता वालों को शामिल किया गया है, जबकि राष्ट्रीय विकलांगता पेंशन के लिए 40 प्रतिशत से अधिक विकलांगता आवश्यक है। राज्य आंदोलन में हिस्सा लेने वाले विकलांग नेता भूपेश देव ताऊ का कहना है कि समय पर पेंशन तक नहीं देना विकलांगों के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैये को दर्शाता है। नियमित रूप से पेंशन देने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
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विकलांग भरण-पोषण को एक पैसे का अनुदान नहीं

प्रदेश सरकार ने 18 वर्ष तक के विकलांगों के लिए अनुदान का प्रावधान किया है। पहली अप्रैल 2015 से शुरू इस योजना में विकलांग की प्रतिशत तय नहीं की है, इसके लिए अब तक एक भी रुपया इस मद में नहीं दिया जा सका है। समाज कल्याण विभाग का कहना है कि योजना के तहत 52 आवेदन पत्र आए हैं, मगर धन नहीं मिलने से अब तक भुगतान नहीं किया जा सका है। इस योजना में विकलांगों को 500 रुपये प्रति माह दिया जाना है।


पहाड़ के लिए फायदेमंद नहीं ट्राईसाइकिल
राज्य आंदोलनकारी एवं विकलांग नेता मकर सिंह और शिवराज महराना का कहना है कि विकलांगों के प्रति न समाज का सोच बदला है और न ही सरकार का नजरिया। यहां तक कि पहाड़ की परिस्थितियों के मद्देनजर उपकरण तक नहीं दिए जा रहे हैं। बैसाखी के सहारे चलने वालों के लिए पहाड़ पर ट्राईसाइकिल किसी काम की नहीं है। पहाड़ के ढलान और चढ़ाव में इसका उपयोग नहीं है। उनका कहना है कि कम से कम इसके बदले गियर वाली साइकिल दी जानी चाहिए।

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