वाल्मीकि समाज के बच्चों की प्रेरणास्रोत बनीं रीता
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लोहाघाट (चंपावत)। वाल्मीकि समाज के बच्चों को गोद लेकर शुरू की पढ़ाई-लिखाई को अब कामयाबी के पंख लगने लगे हैं। इस बार के उत्तराखंड हाईस्कूल बोर्ड परीक्षा में सरोज वाल्मीकि ने 65 फीसदी अंकों के साथ परीक्षा पास की। वह इस वर्ग की पहली प्रथम श्रेणी पास छात्रा बनी। मुस्कान, रोहिना, आकांक्षा के भी अच्छे अंक आए। इस काम की शुरुआत 2009 में तीलू रौतेली पुरस्कार प्राप्त रीता गहतोड़ी ने की थी। तबसे वे इस समाज के 24 बच्चों को गोद लेकर उनकी पढ़ाई करवा रही हैं। अपने खर्चे पर कापी-किताबों आदि का प्रबंध करती हैं।
सफलता से गदगद सरोज और उसके परिजन इस सफलता का श्रेय परिजन रीता को दे रहे हैं। उनका कहना है कि रीता द्वारा इन बच्चों को आगे बढ़ाने की दिशा में किए गए प्रयास अब दिखने लगे हैं। समाज के तानों के बावजूद रीता ने वाल्मीकि समाज को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया। वाल्मीकि समुदाय के बच्चों को समाज की मुख्यधारा में लाने और उनके प्रति बढ़ते लगाव को देखते हुए रीता को काफी संघर्ष करना पड़ा, लेकिन उसने हार नहीं मानी।
सरोज वाल्मीकि का कहना है कि रीता दीदी वाल्मीकि समाज के बच्चों को पढ़ा-लिखाकर आत्मविश्वास भी देती हैं। रोजाना उन्हें दो घंटे तक पढ़ाती हैं। इस हौसले से प्रथम श्रेणी में परीक्षा पास की। अब अगला लक्ष्य आईएएस बनने के लिए खूब मेहनत करने की है। रीता गहतोड़ी का कहना है कि उनका इरादा वाल्मीकि समाज के बच्चों को पढ़ा-लिखाकर आदर्श नागरिक बनाने का है। वाल्मीकि समाज के लिए काम करने के दौरान उन्हें काफी विरोध भी सहना पड़ा, लेकिन इसकी परवाह किए बगैर वह उन्हें पढ़ाने में लग गई। उनका कहना है कि बच्चों में काफी प्रतिभा है, जरूरत उन्हें तराशने की है। जगह की कमी की वजह से वह वाल्मीकि समाज के बच्चों को सार्वजनिक शौचालय के बरामदे में पढ़ाती थीं।