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चमोली के नीती घाटी में बढ़ेगा याक का कुनबा
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जिला प्रशासन ने नीती घाटी में पशुपालन विभाग के संरक्षण में रखे गए याकों का कुनबा बढ़ाने की योजना तैयार की है। इसके लिए घाटी के लाता गांव में याक रखने के लिए बीएडीपी (बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्लान) के तहत करीब 24 लाख की लागत से एक बाड़ा और शेल्टर तैयार किया जाएगा, जिससे यहां याकों का प्रजनन हो सके।
याकों की देखभाल के लिए एक कर्मचारी भी तैनात किया जाएगा। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा. शरत कुमार भंडारी ने बताया कि नीती घाटी के सुरांईथोटा में मौजूदा समय में नौ याक हैं। याकों की संख्या बढ़ाने के लिए उन्हें एक शेल्टर में रखा जाएगा और करीब 500 मीटर का बाड़ा भी तैयार किया जाएगा। याकों की प्रजनन क्षमता बढ़ाने के लिए उन्हें पौष्टिक आहार भी खिलाया जाएगा।
स्वरोजगार का बन सकता है जरिया
गोपेश्वर। वर्ष 2018 में बेरोजगार को बढ़ावा देने के लिए चमोली के पशुपालन विभाग ने बदरीनाथ धाम में हिमालयी ऊंट की सवारी योजना शुरू की थी। योजना के अनुसार बदरीनाथ धाम में तीर्थयात्री और पर्यटकों को पिछले साल हिमालयी ऊंट यानी याक की सवारी कर हिमालय के नैसर्गिक सौंदर्य के दीदार कराए गए थे। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा. शरत कुमार भंडारी का कहना है कि याक स्वरोजगार का मजबूत जरिया बन सकता है। आने वाले समय में बदरीनाथ धाम में हिमालयी ऊंट की सवारी योजना को जारी रखा जाएगा।
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उत्तराखंड में हैं 67 याक
वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान तिब्बत की ओर से याक का एक समूह भारतीय सीमा क्षेत्र में पहुंच गया था। भारतीय सेना ने इन्हें जिला प्रशासन को सौंप दिया था। तब से चमोली जिले का पशुपालन विभाग इन याकों की देखरेख करता है। मौजूदा समय में घाटी में नौ याक हैं। शीतकाल में ये सुरांईथोटा और ग्रीष्मकाल में द्रोणागिरी गांव के उच्च हिमालयी क्षेत्र में रहते हैं। जबकि उत्तराखंड के चमोली, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी में 67 याक हैं। याक हिमालयी क्षेत्र में समुद्र तल से 8000 फीट की ऊंचाई पर पाया जाने वाला पशु है। 15 से 20 दिन तक याक बर्फ खाकर भी जीवित रह सकता है। इसलिए इसे हिमालय का ऊंट भी कहा जाता है।
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याकों की देखभाल के लिए एक कर्मचारी भी तैनात किया जाएगा। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा. शरत कुमार भंडारी ने बताया कि नीती घाटी के सुरांईथोटा में मौजूदा समय में नौ याक हैं। याकों की संख्या बढ़ाने के लिए उन्हें एक शेल्टर में रखा जाएगा और करीब 500 मीटर का बाड़ा भी तैयार किया जाएगा। याकों की प्रजनन क्षमता बढ़ाने के लिए उन्हें पौष्टिक आहार भी खिलाया जाएगा।
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स्वरोजगार का बन सकता है जरिया
गोपेश्वर। वर्ष 2018 में बेरोजगार को बढ़ावा देने के लिए चमोली के पशुपालन विभाग ने बदरीनाथ धाम में हिमालयी ऊंट की सवारी योजना शुरू की थी। योजना के अनुसार बदरीनाथ धाम में तीर्थयात्री और पर्यटकों को पिछले साल हिमालयी ऊंट यानी याक की सवारी कर हिमालय के नैसर्गिक सौंदर्य के दीदार कराए गए थे। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा. शरत कुमार भंडारी का कहना है कि याक स्वरोजगार का मजबूत जरिया बन सकता है। आने वाले समय में बदरीनाथ धाम में हिमालयी ऊंट की सवारी योजना को जारी रखा जाएगा।
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उत्तराखंड में हैं 67 याक
वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान तिब्बत की ओर से याक का एक समूह भारतीय सीमा क्षेत्र में पहुंच गया था। भारतीय सेना ने इन्हें जिला प्रशासन को सौंप दिया था। तब से चमोली जिले का पशुपालन विभाग इन याकों की देखरेख करता है। मौजूदा समय में घाटी में नौ याक हैं। शीतकाल में ये सुरांईथोटा और ग्रीष्मकाल में द्रोणागिरी गांव के उच्च हिमालयी क्षेत्र में रहते हैं। जबकि उत्तराखंड के चमोली, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी में 67 याक हैं। याक हिमालयी क्षेत्र में समुद्र तल से 8000 फीट की ऊंचाई पर पाया जाने वाला पशु है। 15 से 20 दिन तक याक बर्फ खाकर भी जीवित रह सकता है। इसलिए इसे हिमालय का ऊंट भी कहा जाता है।