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पटाखे नहीं भैलो नृत्य कर मनाते हैं दिवाली
Chamoli
Updated Thu, 23 Oct 2014 05:32 AM IST
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कर्णप्रयाग। भैला ओ भैला, चल खेली औला, नाचा, कूदा मारा फाल.. फिर बौड़ी ऐगी बग्वाल... लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी के गीत के ये बोल, गांवों में दीपावली के उत्सव और परंपराओं को बयां करता है। दीपावली के दौरान आधुनिक साज-सज्जा और रस्मों के बीच चांदपुर पट्टी के गांवों में दीपावली की पारंपरिकता आज भी भैलो नृत्य को संजोए हुए है।
जनपद चमोली के चांदपुर पट्टी के गांवों में धनतेरस के दिन से ग्रामीण भैलो खेलने लगते हैं। पुरुष और महिलाएं अलग-अलग समूह में पारंपरिक चांछड़ी और थड्या नृत्य में दीपावली के गीत गाते हैं। दीपावली महालक्ष्मी पूजन के दिन गांव के पंचायत चौक में भैलो की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है और प्रसाद वितरण होता है। इस दिन यहां के लोग पटाखे नहीं फोड़ते हैं। इसके बाद पंचायत चौक में ढोल-दमाऊं की थाप के साथ भैलो नृत्य रातभर होता है। लोकगीत, मांगल और जागरों के साथ छिल्लों से लेकर तिल, बंगजीरे और हिंसर की लकड़ी से बनाए गए भैलो को हाथ में लेकर हाथों में भैलो लेकर कई नर्तक करतब दिखाते हैं। भैलो रे भैलो, काखड़ी को रैलू, उज्यालू आलो अंधेरो भगलू.. भैलो गीत गाते हुए भलसो गांव निवासी वयोवृद्ध उदय सिंह नेगी बताते हैं कि उनके गांव में भैलो की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ग्रामीण आज भी पटाखों के बजाय भैलो नृत्य के साथ आनंदित भाव से तीन दिनों तक दीपावली मनाते हैं। आदिबदरी गांव और बाजार, जुलगढ़ सहित सिलपाटा क्षेत्र के कुछ गांवों में भी भैलो नृत्य की परंपरा कायम है।
पंचायत चौंरी में होता है भैलो नृत्य
कर्णप्रयाग ब्लाक के डिम्मर गांव में पंचायत चौंरी में भी दीपावली में भैलो नृत्य होता है। इस दिन गांव में स्थित प्राचीन लक्ष्मी नारायण, चंडी माई और खांडू देवता के मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। महिला और पुरुष के अलग-अलग समूह बनाकर छिल्लों के भैलो बनाकर देर रात तक मांगल, जागर और लोकगीतों के साथ भैलो नृत्य करते हैं। डीपी डिमरी, डा. भुवनेश्वर प्रसाद डिमरी, शैलेंद्र प्रसाद डिमरी बताते हैं कि भैलो नृत्य में गांव की सहभागिता के साथ नई पीढ़ी को भी इस परंपरा के बारे में जानकारी मिलती है।
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जनपद चमोली के चांदपुर पट्टी के गांवों में धनतेरस के दिन से ग्रामीण भैलो खेलने लगते हैं। पुरुष और महिलाएं अलग-अलग समूह में पारंपरिक चांछड़ी और थड्या नृत्य में दीपावली के गीत गाते हैं। दीपावली महालक्ष्मी पूजन के दिन गांव के पंचायत चौक में भैलो की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है और प्रसाद वितरण होता है। इस दिन यहां के लोग पटाखे नहीं फोड़ते हैं। इसके बाद पंचायत चौक में ढोल-दमाऊं की थाप के साथ भैलो नृत्य रातभर होता है। लोकगीत, मांगल और जागरों के साथ छिल्लों से लेकर तिल, बंगजीरे और हिंसर की लकड़ी से बनाए गए भैलो को हाथ में लेकर हाथों में भैलो लेकर कई नर्तक करतब दिखाते हैं। भैलो रे भैलो, काखड़ी को रैलू, उज्यालू आलो अंधेरो भगलू.. भैलो गीत गाते हुए भलसो गांव निवासी वयोवृद्ध उदय सिंह नेगी बताते हैं कि उनके गांव में भैलो की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ग्रामीण आज भी पटाखों के बजाय भैलो नृत्य के साथ आनंदित भाव से तीन दिनों तक दीपावली मनाते हैं। आदिबदरी गांव और बाजार, जुलगढ़ सहित सिलपाटा क्षेत्र के कुछ गांवों में भी भैलो नृत्य की परंपरा कायम है।
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पंचायत चौंरी में होता है भैलो नृत्य
कर्णप्रयाग ब्लाक के डिम्मर गांव में पंचायत चौंरी में भी दीपावली में भैलो नृत्य होता है। इस दिन गांव में स्थित प्राचीन लक्ष्मी नारायण, चंडी माई और खांडू देवता के मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। महिला और पुरुष के अलग-अलग समूह बनाकर छिल्लों के भैलो बनाकर देर रात तक मांगल, जागर और लोकगीतों के साथ भैलो नृत्य करते हैं। डीपी डिमरी, डा. भुवनेश्वर प्रसाद डिमरी, शैलेंद्र प्रसाद डिमरी बताते हैं कि भैलो नृत्य में गांव की सहभागिता के साथ नई पीढ़ी को भी इस परंपरा के बारे में जानकारी मिलती है।
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