{"_id":"56f04b8b4f1c1bb21bf14d24","slug":"the-tradition-of-holi-songs-in-kumaon","type":"story","status":"publish","title_hn":"कुमाऊं में होली गीतों की परंपरा ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कुमाऊं में होली गीतों की परंपरा
दीप जोशी/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा।
Updated Tue, 22 Mar 2016 01:00 AM IST
विज्ञापन
होली
- फोटो : मदन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अल्मोड़ा। बृज के बाद कुमाऊं अंचल में ही होली बहुत धूमधाम से मनाई जाती है। एकादशी के दिन रंग की शुरुआत होते ही कुमाऊं भर में विशिष्ट होली गीतों के सुर माहौल में रंग और मस्ती भर देते हैं। कुमाऊंनी संस्कृति के जानकारों का मानना है कि कुमाऊं में होली गीतों की परंपरा बृज के लोगों के माध्यम से ही हुई। इसी कारण पहाड़ में प्रचलित होली गीतों में बृज का पुट मिलता है।
विज्ञापन
बृज की तरह यहां के अधिकांश होली गीत राधा-कृष्ण के प्रणय प्रसंगों पर आधारित हैं। रंगकर्म और संस्कृति के जानकार बताते हैं कि कुमाऊं में होली गीतों की शुरुआत बृज के लोगों के माध्यम से हुई। उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक दौर में जब मनोरंजन के साधन नहीं थे, उस समय रासलीला और नौटंकी में निपुण बृज के कलाकार इस क्षेत्र में आते थे और एक दो महीने यहां रहकर अनेक कार्यक्रम किया करते थे।
विज्ञापन
बृज के कलाकार यहां होली गीत भी सुनाया करते थे। धीरे-धीरे बृज के कई होली गीत यहां भी प्रचलित हो गए। बाद के वर्षों में स्थानीय संस्कृति कर्मियों ने भी कई होली गीतों की रचना की। उल्लेखनीय है कि बृज भूमि का इतिहास राधा-कृष्ण से जुड़ा है। होली के जो भी पद गाए जाते हैं उनमें अधिकांश राधा-कृष्ण के प्रणय प्रसंगों पर आधारित हैं।
विज्ञापन
कुमाऊं अंचल में होली का उत्सव काफी समय तक चलता है। अब से करीब तीन माह पहले पौष माह से ही होली की बैठकें शुरू हो जाती हैं। शिवरात्रि के बाद होली की बैठकें अधिक जमने लगती हैं और एकादशी के दिन रंग की शुरुआत होते ही होली पूरे रंग में आ जाती है।
ग्रामीण इलाकों में खड़ी होली का प्रचलन अधिक है। नौकरी पेशा आदि कारणों से घर से बाहर रहने वाले लोग इन दिनों जैसे भी हो अपने गांव पहुंचकर होली का आनंद लेते हैं। खड़ी होली के कई गीत काफी लोकप्रिय हैं। इनमें यह होली गीत काफी गाया जाता है-
जल कैसे भरूं यमुना गहरी..
धीरे चलूं घर सास बुरी है
धमके चलूं छलके गगरी
जल कैसे भरूं....
अल्मोड़ा। अल्मोड़ा को सांस्कृतिक नगरी कहा जाता है। संस्कृति कर्मियों का मानना है कि कुमाऊं में होली गीतों का इतिहास अल्मोड़ा से ही शुरू हुआ। उसके बाद नैनीताल, पिथौरागढ़, रानीखेत आदि स्थानों में बैठकी होली शुरू हुई। बृज की तरह कुमाऊं में गाए जाने वाले होली गीत भी शास्त्रीय गीतों पर आधारित हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी शिवचरण पांडे कहते हैं कि शास्त्रीय रागों पर आधारित होते हुए भी गाने के लिए खास शास्त्रीय बंधन नहीं होता।
यह भी कहा जा सकता है कि होली को शास्त्रीय बंधन में बांधने की कोशिश की जाती है तो वह अपना सौंदर्य खो देती है। होली के असंख्य गीत लिखे गए हैं और किस गीत की रचना किसके द्वारा की गई यह शोध का विषय है। फिर भी जाने माने रचनाकार चारु चंद्र पांडे द्वारा रचित यह होली काफी पसंद की जाती है-
चंद्र बदनी खोलो द्वार
तिहारे मनमोहन ठाढ़े हैं होली खेलन को...
महेश प्रसाद गौड़ द्वारा लिखा यह होली गीत भी काफी गाया जाता है-
सइयां तू प्रीत न जाने
अंगिया मोरी रंग में ही साने...
अल्मोड़ा। कुमाऊंनी होली की एक बड़ी विशेषता यह है कि होली के दिनों में आम तौर पर होली के कलाकार और दर्शक अलग-अलग नहीं होते बल्कि हर व्यक्ति कलाकार बन जाता है। महिला, पुरुष, बुजुर्ग और बच्चे सभी लोग समूह में होली गाते और नृत्य करते हैं।