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अल्मोड़ा शहर को कब मिलेगा बंदरों के आतंक से छुटकारा

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Wed, 02 Feb 2022 12:30 AM IST
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Terror of Monkeys
अल्मोड़ा में एक मकान की छत में बैठा बंदर। - फोटो : ALMORA
अल्मोड़ा। पहाड़ में तेंदुए तो आतंक का पर्याय बने ही थे। अब बंदरों के आतंक से शहरी और ग्रामीण सर्वाधिक परेशान हैं। अल्मोड़ा में पिछले दो माह में 54 लोगों पर बंदरों ने हमला कर घायल कर दिया। ये आंकड़े तस्दीक करते हैं कि बंदरों से आमजन बेहद परेशान है।
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ग्रामीण क्षेत्रों में बंदरों ने खेती चौपट कर दी है तो शहरी क्षेत्र में कई जगह लोग बंदरों के डर से अपने घरों के कैद रहते हैं। शहर का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां बंदर उत्पात नहीं मचा रहे। कहीं बिजली की लाइनें बंदर तोड़ते हैं तो कहीं दुकानों से बंदरों के सामान चुराने के मामले आते हैं। दिन में अगर घर का दरवाजा खुला रहा तो बंदर घर के अंदर घुसकर सामान उठा ले जाते हैं। राहगीरों के हाथ से सामान झपटना तो शहर में आम है। जिन क्षेत्रों में मंदिर है उन क्षेत्रों में बंदरों का आतंक और अधिक है। बच्चे भी बंदरों के डर से घरों में कैद रहते हैं। छतों में सुखाने के लिए डाले गए कपड़े भी बंदर उठा ले जाते हैं। शहरी क्षेत्र में बंदरों को पकड़ने का काम नगरपालिका के जिम्मे है लेकिन नगर पालिका भी बंदरों के आतंक से लोगों को निजात नहीं दिला पा रहा है। बंदरों के काटने पर लोगों को रैबिज का इंजेक्शन लगाने जिला और बेस अस्पताल पहुंचना पड़ता है। जिला अस्पताल में पिछले साल दिसंबर से अब तक बंदरों के हमले से घायल 11 लोग पहुंचे हैं। बेस अस्पताल में भी बंदर के हमले से घायल 43 लोग इलाज के लिए पहुंचे हैं।
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पहाड़ में ट्रकों से छोड़े जाते हैं बंदर
अल्मोड़ा। तराई की अपेक्षा पहाड़ी क्षेत्रों में बंदरों का आतंक अधिक है इसका कारण यहां बंदरों की संख्या अधिक होना है। कई बार देखा गया है कि तराई से पहाड़ को आने वाले ट्रकों में बंदरों को डाल दिया जाता है। जिससे यहां बंदरों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। ग्रामीण क्षेेत्रों से पलायन होने के कारण बंदरों के लिए भोजन न होने से भी बंदर नगरों की ओर रुख कर रहे हैं।
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इन क्षेत्रों में अधिक हैं बंदर
अल्मोड़ा। शहर में एनटीडी, रानीधारा, धारानौला, ढुंगाधारा, सुनारीनौला, लक्ष्मेश्वर, जाखनदेवी, दुगालखोला, ख्त्याड़ी, नरसिंहबाड़ी, पुराना कलेक्ट्रेट, और एलआरसाह रोड स्थित साई मंदिर क्षेत्र में बंदरों का आतंक अधिक है। बिजली के तार तो इन क्षेत्रों में बंदर रोजाना तोड़ते हैं जिससे बिजली व्यवस्था भी बाधित रहती है।
लावारिस कुत्तों के हमले में छात्रा घायल
अल्मोड़ा। नगर में बंदरों के साथ ही लावारिस कुत्तों का भी आतंक है। मंगलवार को कोचिंग क्लास में पढ़ने जा रही एक छात्रा को भी कुत्तों ने काट लिया। छात्रा ने इस संबंध में कोतवाली औ नगर पालिका में शिकायती पत्र भी दिया है। नैनीधारा निवसी गायत्री जोशी के अनुुसार मंगलवार को वह कोचिंग में पढ़ने जा रही थी। टैक्सी स्टेंड के पास कुत्तों के झुंड ने उसे घेरा और हमला कर दिया। इसमें गायत्री बुरी तरह से जख्मी हो गई।
इस बारे में जानकारी जुटाई जा रही है कि कितने लोग नगर में बंदरों के हमले से घायल हुए हैं। पूर्व में बंदरों को पकड़ने का अभियान चलाया गया था। आगे भी अभियान चलाया जाएगा।
- महेंद्र यादव, ईओ नगरपालिका, अल्मोड़ा
रानीखेत में रोजाना पांच लोगों पर हो रहा हमला
रानीखेत (अल्मोड़ा)। रानीखेत में भी बंदरों का आतंक है। सरकारी अस्पताल के आंकड़ों के मुताबिक हर दिन पांच लोग बंदरों के हमले में घायल हो रहे हैं।
रानीखेत नगर, चिलियानौला नगर पालिका, सिलोर, ककलासौं, कंडारखुवा, धूराफाट पट्टी से जुड़े गांवों में बंदरों ने फसल को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है। मकड़ों, बिल्लेख सहित तमाम सब्जी उत्पादन के मशहूर इलाकों में आतंक के चलते सब्जी का उत्पादन सिमट चुका है। रानीखेत नगर, मालरोड, कुंपूर लालकुर्ती में भी आतंक से अछूता नहीं है। इन क्षेत्रों में बंदरों के साथ ही लंगूर भी सक्रिय होने से समस्या और बढ़ गई है। कुंपुर लालकुर्ती, चमड़खान आदि क्षेत्रों में लंगूर अधिक सक्रिय हैं। काश्तकार राजेंद्र बिष्ट ने बताया कि वन विभाग और शासन को जंगली जानवरों के आतंक से निजात दिलाने के प्रयास करने चाहिए। यही हाल रहे तो पारंपरिक कृषि व्यवस्था रसातल में चली जाएगी। पन्याली निवासी शिवराज सिंह माहरा का कहना है कि जब तक वन अधिनियम के मानकों में शिथिलता नहीं की जाती, यह समस्या बदस्तूर जारी रहेगी। चिलियानौला नगर पालिका में बंदरों को पकड़ने की मुहिम भी चलाई गई, लेकिन यह मुहिम भी कारगर साबित नहीं हो सकी है। रानीखेत कैंट की तरफ से भी पूर्व में अभियान चलाया गया था लेकिन बंदरों को पकड़ने की मुहिम बीच में ही दम तोड़ गई। राजकीय अस्पताल के अधीक्षक डा. केके पांडेय ने बताया कि प्रतिदिन बंदरों से काटने वाले पांच केस पहुंचते हैं। यहां रेबीज और टिटनेस के इंजेक्शन पर्याप्त मात्रा में हैं।

बागेश्वर में छह माह में सात लोगों पर हमला
बागेश्वर। पिछले छह महीने में बंदरों के हमले में गरुड़ में तीन, बागेश्वर में दो और कपकोट में दो लोग जख्मी हुए हैं। नेता हर चुनाव में बंदरों के आतंक दिलाने का वादा करते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में बागेश्वर के भाजपा प्रत्याशी ने बंदरों के आतंक से निजात दिलाने के लिए बंदरबाड़ा बनाने की घोषणा की थी, इस घोषणा पर अमल नहीं हुआ। गरुड़ के प्रगतिशील काश्तकार बीबी जोशी, खुनौली के युवा कमल कवि कांडपाल कहते हैं कि चुनाव में एक बार फिर राजनेता बंदरों, सुअरों के आतंक से निजात दिलाने की बातें करेंगे, लेकिन चुनाव के बाद कोई गौर करेगा, इसकी उम्मीद नहीं है। संवाद
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