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हायर सेंटर रेफर होना नियति बन चुकी है दुर्घटना के गंभीर घायलों की
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रानीखेत अस्पताल में ट्रामा सैंटर का भवन। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : RANIKHET
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रानीखेत (अल्मोड़ा)। विकास के नाम पर जनता को कैसे छला जाता है, इसका अंदाजा स्थानीय राजकीय अस्पताल के ट्रामा सेंटर को देखकर लगाया जा सकता है।
करीब 12 साल पूर्व अल्मोड़ा में भवन का लोकार्पण होने के बावजूद कोई प्रगति नहीं हुई है। वोट बटोरने के लिए जनप्रतिनिधि कितने ही सब्जबाग दिखाएं लेकिन हकीकत यह है कि केंद्र में न तो डॉक्टरों का पैनल पहुंचा और न ही उपकरण।
दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल लोग हल्द्वानी या दिल्ली रेफर हो रहे हैं। उपमंडल क्षेत्र की बीमार सड़कों पर आए दिन वाहन दुर्घटनाएं हो रहीं हैं। जिले में कहीं भी ट्रामा सेंटर नहीं है। सन 2000 में एक करोड़ की लागत से ट्रामा सेंटर स्वीकृत हुआ।
भवन बनने के बाद 2009 में लोकार्पण कर दिया, लेकिन सरकारें संसाधन, उपकरण और डॉक्टर जुटाने में नाकाम रही। अस्पताल के अधीक्षक डॉ. केके पांडेय ने बताया कि ट्रामा सेंटर को अस्पताल से मर्ज कर दिया है। अब यहां के लिए सीटी स्कैन मशीन सहित कुछ अन्य संसाधन उपलब्ध कराने की मांग निदेशालय से की गई है।
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ट्रामा सेंटर के लिए जरूरत
1- न्यूरो सर्जन
2- ऑर्थो सर्जन
3- जनरल सर्जन
4- रेडियोलॉजिस्ट
5- एनेस्थेसिस्ट
6- सीटी स्कैन विशेषज्ञ
7- पैरामेडिकल स्टाफ
रानीखेत को उपमंडल का दर्जा हासिल है। सात तहसीलें इस अस्पताल से जुड़ीं हैं। ट्रामा सेंटर का संचालन होना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में ही कई बार बड़ी वाहन दुर्घटनाएं हो जातीं हैं। अभाव के कारण दुर्घटना के गंभीर घायलों को हायर सेंटर भेजना पड़ता है।
-मंजीत भगत, प्रधान तौड़ा, ताड़ीखेत।
रानीखेत अस्पताल पर भिकियासैंण, स्याल्दे, सल्ट, सराईखेत, कर्णप्रयाग, चौखुटिया, ताड़ीखेत, द्वाराहाट की जनता भी निर्भर है। उपमंडल क्षेत्र की सर्पीली सड़कों पर वाहन दुर्घटनाएं होती हैं। इन घायलों समेत कई गंभीर रोगियों की जान बचाई जा सकती है।
-भगवत सिंह नेगी, प्रधान लछीना, ताड़ीखेत।
रानीखेत अस्पताल में उपचार को गढ़वाल क्षेत्र के कुछ हिस्सों के लोग भी पहुंचते हैं। रामनगर और हल्द्वानी समेत ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ने वाले मोटर मार्ग बेहद संवेदनशील हैं। कई बार वाहन दुर्घटनाएं हो जाती हैं। ऐसे गंभीर रोगियों को सीधे रेफर किया जाता है।
-राजेंद्र प्रसाद जोशी, व्यापारी रानीखेत।
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करीब 12 साल पूर्व अल्मोड़ा में भवन का लोकार्पण होने के बावजूद कोई प्रगति नहीं हुई है। वोट बटोरने के लिए जनप्रतिनिधि कितने ही सब्जबाग दिखाएं लेकिन हकीकत यह है कि केंद्र में न तो डॉक्टरों का पैनल पहुंचा और न ही उपकरण।
दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल लोग हल्द्वानी या दिल्ली रेफर हो रहे हैं। उपमंडल क्षेत्र की बीमार सड़कों पर आए दिन वाहन दुर्घटनाएं हो रहीं हैं। जिले में कहीं भी ट्रामा सेंटर नहीं है। सन 2000 में एक करोड़ की लागत से ट्रामा सेंटर स्वीकृत हुआ।
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भवन बनने के बाद 2009 में लोकार्पण कर दिया, लेकिन सरकारें संसाधन, उपकरण और डॉक्टर जुटाने में नाकाम रही। अस्पताल के अधीक्षक डॉ. केके पांडेय ने बताया कि ट्रामा सेंटर को अस्पताल से मर्ज कर दिया है। अब यहां के लिए सीटी स्कैन मशीन सहित कुछ अन्य संसाधन उपलब्ध कराने की मांग निदेशालय से की गई है।
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ट्रामा सेंटर के लिए जरूरत
1- न्यूरो सर्जन
2- ऑर्थो सर्जन
3- जनरल सर्जन
4- रेडियोलॉजिस्ट
5- एनेस्थेसिस्ट
6- सीटी स्कैन विशेषज्ञ
7- पैरामेडिकल स्टाफ
रानीखेत को उपमंडल का दर्जा हासिल है। सात तहसीलें इस अस्पताल से जुड़ीं हैं। ट्रामा सेंटर का संचालन होना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में ही कई बार बड़ी वाहन दुर्घटनाएं हो जातीं हैं। अभाव के कारण दुर्घटना के गंभीर घायलों को हायर सेंटर भेजना पड़ता है।
-मंजीत भगत, प्रधान तौड़ा, ताड़ीखेत।
रानीखेत अस्पताल पर भिकियासैंण, स्याल्दे, सल्ट, सराईखेत, कर्णप्रयाग, चौखुटिया, ताड़ीखेत, द्वाराहाट की जनता भी निर्भर है। उपमंडल क्षेत्र की सर्पीली सड़कों पर वाहन दुर्घटनाएं होती हैं। इन घायलों समेत कई गंभीर रोगियों की जान बचाई जा सकती है।
-भगवत सिंह नेगी, प्रधान लछीना, ताड़ीखेत।
रानीखेत अस्पताल में उपचार को गढ़वाल क्षेत्र के कुछ हिस्सों के लोग भी पहुंचते हैं। रामनगर और हल्द्वानी समेत ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ने वाले मोटर मार्ग बेहद संवेदनशील हैं। कई बार वाहन दुर्घटनाएं हो जाती हैं। ऐसे गंभीर रोगियों को सीधे रेफर किया जाता है।
-राजेंद्र प्रसाद जोशी, व्यापारी रानीखेत।