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रुकिए: छावनी क्षेत्र में जाने के लिए वाहन प्रवेश शुल्क दीजिए प्रथा हुई समाप्त
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रानीखेत का चाइनाव्यू बैरियर। संवाद
- फोटो : RANIKHET
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रानीखेत (अल्मोड़ा)। रक्षा मंत्रालय के निर्देश के बाद छावनी क्षेत्रों में अब वाहन प्रवेश शुल्क पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है। शनिवार देर शाम आदेश पहुंचने के बाद ही मुख्य बैरियर पिलखोली, घिंघारीखाल और गनियाद्योली आदि बैरियरों पर वसूली बंद कर दी गई। यह प्रवेश शुल्क रानीखेत छावनी की आमदनी का बड़ा जरिया था। इससे छावनी परिषद को सालाना लगभग डेढ़ करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ेगा। पूर्व में यहां भी टोल टैक्स वसूला जाता था लेकिन 2006 में कैंट एक्ट में हुए संशोधन के बाद वाहन प्रवेश शुल्क वसूला जा रहा था।
रानीखेत में भी पहले चुंगी प्रथा लागू थी। 1991 में अविभाजित यूपी में सरकार ने नगरपालिकाओं में चुंगी प्रथा समाप्त कर दी थी। ऐसे में रानीखेत में भी छावनी के नागरिकों की ओर से चुंगी वसूली समाप्त करने की मांग जोर पकड़ी। 2006 में छावनी अधिनियम संशोधन में टोल टैक्स की जगह व्हीकल एंट्री टैक्स की व्यवस्था दी गई। हालांकि यहां टोल टैक्स की व्यवस्था जारी रही और वाहन प्रवेश शुल्क वर्ष 2012 से लागू किया गया जो अभी तक चल रहा था। रक्षा मंत्रालय से आए फरमान के बाद शनिवार शाम से बैरियरों को उठा दिया गया और वाहन शुल्क की वसूली तुरंत बंद कर अनुपालन रिपोर्ट तत्काल रक्षा मंत्रालय को भेज दी गई है।
टोल अधीक्षक गोपाल राम ने बताया कि प्रवेश शुल्क प्रथा बंद होने से छावनी परिषद को सालाना लगभग डेढ़ करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि यहां छह बैरियरों पर शुल्क वसूला जाता था। पिलखोली, गनियाद्योली, घिंघारीखाल बैरियर आय का मुख्य जरिया थे। इधर, व्यवस्था समाप्त होने से व्यवसायियों, सैलानियों और स्थानीय नागरिकों को इससे काफी राहत मिलेगी।
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22 संविदा कर्मियों पर लटकी तलवार
रानीखेत। छावनी क्षेत्र में वाहन प्रवेश शुल्क प्रथा समाप्त होने से जहां वाहन चालकों, सैलानियों और नागरिकों में खुशी है, वहीं इन बैरियरों पर संविदा पर कार्यरत 22 कर्मचारियों पर बेरोजगारी की तलवार लटक गई है। छह बैरियरों पर 41 कर्मचारी तैनात थे। जिनमें से 22 कर्मचारी संविदा पर कार्य कर रहे थे। पक्के कर्मचारियों को तो समायोजन करने की व्यवस्था बनाई जाएगी, लेकिन संविदा कर्मचारियों के समायोजन को लेकर क्या रणनीति बनती है, वह भविष्य की बात है। फिलहाल कैंट के पास आर्थिक संसाधनों का बेहद अभाव बना हुआ है। कई संविदा कर्मचारियों ने विभाग में कहीं भी समायोजित करने के लिए शीघ्र ही छावनी परिषद के मुख्य अधिशासी अधिकारी से मुलाकात करने की बात कही है।
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रानीखेत में भी पहले चुंगी प्रथा लागू थी। 1991 में अविभाजित यूपी में सरकार ने नगरपालिकाओं में चुंगी प्रथा समाप्त कर दी थी। ऐसे में रानीखेत में भी छावनी के नागरिकों की ओर से चुंगी वसूली समाप्त करने की मांग जोर पकड़ी। 2006 में छावनी अधिनियम संशोधन में टोल टैक्स की जगह व्हीकल एंट्री टैक्स की व्यवस्था दी गई। हालांकि यहां टोल टैक्स की व्यवस्था जारी रही और वाहन प्रवेश शुल्क वर्ष 2012 से लागू किया गया जो अभी तक चल रहा था। रक्षा मंत्रालय से आए फरमान के बाद शनिवार शाम से बैरियरों को उठा दिया गया और वाहन शुल्क की वसूली तुरंत बंद कर अनुपालन रिपोर्ट तत्काल रक्षा मंत्रालय को भेज दी गई है।
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टोल अधीक्षक गोपाल राम ने बताया कि प्रवेश शुल्क प्रथा बंद होने से छावनी परिषद को सालाना लगभग डेढ़ करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि यहां छह बैरियरों पर शुल्क वसूला जाता था। पिलखोली, गनियाद्योली, घिंघारीखाल बैरियर आय का मुख्य जरिया थे। इधर, व्यवस्था समाप्त होने से व्यवसायियों, सैलानियों और स्थानीय नागरिकों को इससे काफी राहत मिलेगी।
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22 संविदा कर्मियों पर लटकी तलवार
रानीखेत। छावनी क्षेत्र में वाहन प्रवेश शुल्क प्रथा समाप्त होने से जहां वाहन चालकों, सैलानियों और नागरिकों में खुशी है, वहीं इन बैरियरों पर संविदा पर कार्यरत 22 कर्मचारियों पर बेरोजगारी की तलवार लटक गई है। छह बैरियरों पर 41 कर्मचारी तैनात थे। जिनमें से 22 कर्मचारी संविदा पर कार्य कर रहे थे। पक्के कर्मचारियों को तो समायोजन करने की व्यवस्था बनाई जाएगी, लेकिन संविदा कर्मचारियों के समायोजन को लेकर क्या रणनीति बनती है, वह भविष्य की बात है। फिलहाल कैंट के पास आर्थिक संसाधनों का बेहद अभाव बना हुआ है। कई संविदा कर्मचारियों ने विभाग में कहीं भी समायोजित करने के लिए शीघ्र ही छावनी परिषद के मुख्य अधिशासी अधिकारी से मुलाकात करने की बात कही है।