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कोरोना महामारी में लोगों को फिर महसूस हुई संयुक्त परिवारों की जरुरत
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अल्मोड़ा। बदलते जमाने में संयुक्त परिवार का ताना बाना बिखर गया है। लोगों ने एकल परिवार को ही तरक्की का पैमाना मान लिया है। कोरोना महामारी से पहले लोगों ने यह मान लिया था कि एकल परिवार ही अच्छा होता है लेकिन कोविड-19 ने संयुक्त परिवारों की अवधारणा को फिर से बल दिया है। लोग भी संयुक्त परिवारों के मायने समझ गए। कोरोना के दौरान एकल परिवारों को अधिक दिक्कतें हुईं।
सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के पत्रकारिता, जनसंचार विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. ललित जोशी कहते हैं कि बिखरे परिवारों का कोई अस्तित्व नहीं होता। एक दूसरे की देखभाल करने के लिए एकल परिवारों से ज्यादा संयुक्त परिवार आवश्यक हैं।
कोरोना संक्रमित सदस्यों की देखभाल करने, होम आइसोलेशन में गए सदस्यों के खानपान, उनके इलाज, दवा आदि के लिए संयुक्त परिवार ही काम आए अन्यथा कोरोना जैसी विभीषिका के कारण एकल परिवार में यह व्यवस्था नहीं हो पाती। एकल परिवारों को इन समस्याओं से अधिक गुजरना पड़ा। उनकी देखभाल नहीं हो पाई।
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इस कारण वे अधिक परेशान रहे। जिन परिवारों में बुजुर्ग हैं, उन बुजुर्गों के लिए संयुक्त परिवार में होने के कारण परिवार के अन्य सदस्यों ने भावनात्मक और व्यक्तिगत सहयोग दिया। यदि एकल परिवार होता तो वहां बुजुर्गों को कोरोना की स्थिति में कोई देखभाल करने वाला नहीं होता। बुजुर्ग कोरोना के भय से ही दम तोड़ देते।
कोरोना काल में संयुक्त परिवारों में लोगों को सामाजिक सुरक्षा मिली है। 87 वर्षीय बुजुर्ग तेज सिंह ने बताया कि कुछ दशक पहले तक लोग संयुक्त परिवार में ही रहते थे। संयुक्त परिवारों में रहने के कई फायदे भी थे। विपत्ति के समय स्वजन मनोबल बढ़ाने के अलावा मजबूती के साथ खड़े रहते थे।
परिवार के हर सदस्य को काम सौंपा जाता था। यदि कभी बड़ी से बड़ी समस्या आती थी तो उसका आसानी से निस्तारण भी हो जाता था। अब बदलते जमाने में संयुक्त परिवार भार जैसे लगने लगे हैं। कोरोनाकाल में फिर से लोग संयुक्त परिवार की जरूरत महसूस कर रहे हैं।
शिक्षा, रोजगार आदि कारणों से हो रहा है संयुक्त परिवारों का विघटन
अल्मोड़ा। समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि शिक्षा, रोजगार समेत अन्य कारणों से संयुक्त परिवारों का विघटन हो रहा है। सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष और मनोविज्ञानी प्रोफेसर मधुलता नयाल ने कहा कि शिक्षा, रोजगार की तलाश में अधिसंख्य लोग घरों से बाहर निकलते हैं।
फिर वह वहीं के होकर रह जाते हैं। प्रो. मधुलता ने कहा कि शिक्षा, नौकरी आदि कारणों से संयुक्त परिवार टूट कर एकल परिवारों में बदलते जा रहे हैं। एकल परिवारों में रहने वाले लोग फिर उसी में खुशियां तलाश लेते हैं। एकल परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
संयुक्त परिवार विपत्ति के सामने भी झुकने नहीं देता : राजेश
अल्मोड़ा। नगर के जौहरी बाजार निवासी राजेश भट्ट संयुक्त परिवार में रहते हैं। राजेश का कारखाना बाजार में किराना स्टोर है। उनकी पत्नी नीमा गृहणी है।
बेटा यश और वैभव दोनों पढ़ाई करते हैं। राजेश के साथ छोटे भाई अशोक भट्ट, बहन हेमलता भट्ट, वृद्ध माता सरस्वती भट्ट भी रहतीं हैं। छोटा भाई अशोक भट्ट कारखाना बाजार में साइबर कैफे चलाते हैं। उनकी पत्नी निर्मला गृहिणी हैं।
बेटा काव्यांश और बेटी प्रियांशी पढ़ते हैं। बहन हेमलता जिला अस्पताल में कार्यरत हैं। राजेश बताते हैं कि परिवार में सभी सदस्य मिलजुल कर काम करते हैं। बड़ा से बड़ा काम भी आसानी से हो जाता है।
बच्चों को दादी का प्यार मिलता है तो बहुओं को सास का सहारा। कोरोनाकाल में संयुक्त परिवार का लाभ मिला है। राजेश ने कहा कि संयुक्त परिवार की एकजुटता ही उसका संकट में मनोबल बढ़ाती है। संयुक्त परिवार वह वटवृक्ष है जो विपत्ति के सामने भी झुकने नहीं देता है।
नैनीताल के एक होटल में नौकरी करता था। कोरोनाकाल में रोजगार चला गया। बेरोजगार होने पर अपने गांव लौट आया हूं और परिवार संग रह रहा हूं। बेरोजगारी के दौर में मेरा परिवार ही मेरी सबसे बड़ी ताकत और सहारा बनी। कोरोना महामारी परिवार के मायने भी समझ में आ गए हैं। - सुंदर सिंह नगरकोटी, गौजानी।
दिल्ली में टैक्सी चलाता था। टैक्सी खरीदने के लिए बैंक से ऋण लिया था। दिल्ली में लॉकडाउन होने के कारण काम ठप हो गया है। फिर अपने गांव लौट आया। अब अपने परिवार संग रह रहा हूं। कोरोना में सबसे बड़ी समस्या अकेलापन है। कोरोना ने परिवार की अवधारणा को मजबूत किया है।
- जगदीश सिंह रावत, लमटाना।
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सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के पत्रकारिता, जनसंचार विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. ललित जोशी कहते हैं कि बिखरे परिवारों का कोई अस्तित्व नहीं होता। एक दूसरे की देखभाल करने के लिए एकल परिवारों से ज्यादा संयुक्त परिवार आवश्यक हैं।
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कोरोना संक्रमित सदस्यों की देखभाल करने, होम आइसोलेशन में गए सदस्यों के खानपान, उनके इलाज, दवा आदि के लिए संयुक्त परिवार ही काम आए अन्यथा कोरोना जैसी विभीषिका के कारण एकल परिवार में यह व्यवस्था नहीं हो पाती। एकल परिवारों को इन समस्याओं से अधिक गुजरना पड़ा। उनकी देखभाल नहीं हो पाई।
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इस कारण वे अधिक परेशान रहे। जिन परिवारों में बुजुर्ग हैं, उन बुजुर्गों के लिए संयुक्त परिवार में होने के कारण परिवार के अन्य सदस्यों ने भावनात्मक और व्यक्तिगत सहयोग दिया। यदि एकल परिवार होता तो वहां बुजुर्गों को कोरोना की स्थिति में कोई देखभाल करने वाला नहीं होता। बुजुर्ग कोरोना के भय से ही दम तोड़ देते।
कोरोना काल में संयुक्त परिवारों में लोगों को सामाजिक सुरक्षा मिली है। 87 वर्षीय बुजुर्ग तेज सिंह ने बताया कि कुछ दशक पहले तक लोग संयुक्त परिवार में ही रहते थे। संयुक्त परिवारों में रहने के कई फायदे भी थे। विपत्ति के समय स्वजन मनोबल बढ़ाने के अलावा मजबूती के साथ खड़े रहते थे।
परिवार के हर सदस्य को काम सौंपा जाता था। यदि कभी बड़ी से बड़ी समस्या आती थी तो उसका आसानी से निस्तारण भी हो जाता था। अब बदलते जमाने में संयुक्त परिवार भार जैसे लगने लगे हैं। कोरोनाकाल में फिर से लोग संयुक्त परिवार की जरूरत महसूस कर रहे हैं।
शिक्षा, रोजगार आदि कारणों से हो रहा है संयुक्त परिवारों का विघटन
अल्मोड़ा। समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि शिक्षा, रोजगार समेत अन्य कारणों से संयुक्त परिवारों का विघटन हो रहा है। सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष और मनोविज्ञानी प्रोफेसर मधुलता नयाल ने कहा कि शिक्षा, रोजगार की तलाश में अधिसंख्य लोग घरों से बाहर निकलते हैं।
फिर वह वहीं के होकर रह जाते हैं। प्रो. मधुलता ने कहा कि शिक्षा, नौकरी आदि कारणों से संयुक्त परिवार टूट कर एकल परिवारों में बदलते जा रहे हैं। एकल परिवारों में रहने वाले लोग फिर उसी में खुशियां तलाश लेते हैं। एकल परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
संयुक्त परिवार विपत्ति के सामने भी झुकने नहीं देता : राजेश
अल्मोड़ा। नगर के जौहरी बाजार निवासी राजेश भट्ट संयुक्त परिवार में रहते हैं। राजेश का कारखाना बाजार में किराना स्टोर है। उनकी पत्नी नीमा गृहणी है।
बेटा यश और वैभव दोनों पढ़ाई करते हैं। राजेश के साथ छोटे भाई अशोक भट्ट, बहन हेमलता भट्ट, वृद्ध माता सरस्वती भट्ट भी रहतीं हैं। छोटा भाई अशोक भट्ट कारखाना बाजार में साइबर कैफे चलाते हैं। उनकी पत्नी निर्मला गृहिणी हैं।
बेटा काव्यांश और बेटी प्रियांशी पढ़ते हैं। बहन हेमलता जिला अस्पताल में कार्यरत हैं। राजेश बताते हैं कि परिवार में सभी सदस्य मिलजुल कर काम करते हैं। बड़ा से बड़ा काम भी आसानी से हो जाता है।
बच्चों को दादी का प्यार मिलता है तो बहुओं को सास का सहारा। कोरोनाकाल में संयुक्त परिवार का लाभ मिला है। राजेश ने कहा कि संयुक्त परिवार की एकजुटता ही उसका संकट में मनोबल बढ़ाती है। संयुक्त परिवार वह वटवृक्ष है जो विपत्ति के सामने भी झुकने नहीं देता है।
नैनीताल के एक होटल में नौकरी करता था। कोरोनाकाल में रोजगार चला गया। बेरोजगार होने पर अपने गांव लौट आया हूं और परिवार संग रह रहा हूं। बेरोजगारी के दौर में मेरा परिवार ही मेरी सबसे बड़ी ताकत और सहारा बनी। कोरोना महामारी परिवार के मायने भी समझ में आ गए हैं। - सुंदर सिंह नगरकोटी, गौजानी।
दिल्ली में टैक्सी चलाता था। टैक्सी खरीदने के लिए बैंक से ऋण लिया था। दिल्ली में लॉकडाउन होने के कारण काम ठप हो गया है। फिर अपने गांव लौट आया। अब अपने परिवार संग रह रहा हूं। कोरोना में सबसे बड़ी समस्या अकेलापन है। कोरोना ने परिवार की अवधारणा को मजबूत किया है।
- जगदीश सिंह रावत, लमटाना।