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देश की दूसरी वैष्णवी शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध है दूनागिरी मंदिर
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द्वाराहाट का दूनागिरी मंदिर। संवाद
- फोटो : RANIKHET
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द्वाराहाट (अल्मोड़ा)। उत्तराखंड में अनेक पौराणिक और सिद्ध शक्तिपीठ हैं। उन्हीं शक्तिपीठों में द्रोणगिरि वैष्णवी शक्तिपीठ है। जिसे मां दूनागिरि के नाम से पहचाना जाता है। भारत में वैष्णवी शक्तिपीठ के नाम से विख्यात दो शक्तिपीठ हैं। जिसमें एक जम्मू कश्मीर में स्थित वैष्णवी देवी हैं। दूसरी उत्तराखंड के कुमाऊं में स्थित द्रोणागिरि (दूनागिरि) शक्तिपीठ है।
हिमालयन गजेटियर के लेखक ईटी एटकिंसन, कुमाऊं का इतिहास के लेखक बद्री दत्त पांडे, प्रोफेसर केडी बाजपेई सहित अन्य आधुनिक इतिहासकारों ने भी एकमत होकर अल्मोड़ा जिले की द्वाराहाट के ऊपर स्थित दूनागिरि को ही प्राचीन ग्रंथों में उल्लिखित द्रोणागिरि स्वीकार किया है।
अल्मोड़ा से 65 किमी तथा रानीखेत से 38 किमी दूर कर्णप्रयाग मोटर मार्ग पर स्थित आठ हजार फुट की ऊंचाई पर द्रोणगिरि शक्तिपीठ स्थित है। यहां जाने के लिए मंगलीखान तक वाहन से तथा यहां से डेढ़ किमी लगभग पांच सौ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर शिखर से विराट हिमालय की गगनचुंबी पर्वत श्रंखलाएं, गेवाड़ घाटी ,कैड़ारौ घाटी आदि के भव्य दर्शन होते हैं। इस मंदिर में श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा है। हर नवरात्र में यहां दूर दराज से श्रद्धालु आकर पूजा अर्चना करते हैं। पर्यटक भी यहां पहुंचकर शीश नवाना नहीं भूलते। बताते हैं कि द्वापर युग में द्रोणाचार्य ने यहां आकर तपस्या की। जिनके नाम से इस पर्वत का नाम द्रोणागिरि पर्वत हुआ। यह पूरा क्षेत्र विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियों और नैसर्गिक खूबसूरती से भरा हुआ है। चैत्राष्टमी और आश्विन अष्टमी को यहां पर भव्य मेला लगता है।
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हिमालयन गजेटियर के लेखक ईटी एटकिंसन, कुमाऊं का इतिहास के लेखक बद्री दत्त पांडे, प्रोफेसर केडी बाजपेई सहित अन्य आधुनिक इतिहासकारों ने भी एकमत होकर अल्मोड़ा जिले की द्वाराहाट के ऊपर स्थित दूनागिरि को ही प्राचीन ग्रंथों में उल्लिखित द्रोणागिरि स्वीकार किया है।
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अल्मोड़ा से 65 किमी तथा रानीखेत से 38 किमी दूर कर्णप्रयाग मोटर मार्ग पर स्थित आठ हजार फुट की ऊंचाई पर द्रोणगिरि शक्तिपीठ स्थित है। यहां जाने के लिए मंगलीखान तक वाहन से तथा यहां से डेढ़ किमी लगभग पांच सौ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर शिखर से विराट हिमालय की गगनचुंबी पर्वत श्रंखलाएं, गेवाड़ घाटी ,कैड़ारौ घाटी आदि के भव्य दर्शन होते हैं। इस मंदिर में श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा है। हर नवरात्र में यहां दूर दराज से श्रद्धालु आकर पूजा अर्चना करते हैं। पर्यटक भी यहां पहुंचकर शीश नवाना नहीं भूलते। बताते हैं कि द्वापर युग में द्रोणाचार्य ने यहां आकर तपस्या की। जिनके नाम से इस पर्वत का नाम द्रोणागिरि पर्वत हुआ। यह पूरा क्षेत्र विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियों और नैसर्गिक खूबसूरती से भरा हुआ है। चैत्राष्टमी और आश्विन अष्टमी को यहां पर भव्य मेला लगता है।
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