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भवन बनाने के लिए पहाड़ों में मानकों का नहीं रखा जाता है ध्यान
अमर उजाला ब्यूरो अल्मोड़ा
Updated Sun, 19 Mar 2017 11:43 PM IST
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2011 और 2013 में प्रदेश में आई आपदा हम सबने देखी। आपदा के दौरान और बाद में विषय विशेषज्ञों ने अनियोजित विकास को इसका कारण बताते हुए सरकारों को कई सुझाव भी दिए। यही नहीं अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी हिमालयी राज्यों में होने वाली प्राकृतिक उथल पुथल को लेकर काफी चर्चाएं हुई। हिमालयी क्षेत्रों में अनियोजित विकास विषय पर जर्मनी के प्रसिद्ध टेकिभनकल विश्वविद्यालय ड्रेसडेन (जर्मनी) की शोध छात्रा अल्मोड़ा निवासी नीलाक्षी जोशी का भी मानना है कि पहाड़ों में न तो जमीन की कंट्रोलिंग
है और न ड्रेनेज सिस्टम।
बिल्डिंग इंडस्ट्री कंट्रोल में नहीं होने से लोग पहाड़ों की जमीन को मैदानी जमीन जैसा ही समझ कर बिना मानकों को पूरा किए अंधाधुंध तरीके से भवन निर्माण कर रहे हैं। जो कि भविष्य में पहाड़ों में बड़े खतरे आने का संकेत दे रहा है। उन्होंने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में 80 प्रतिशत मकानों में मानकों का ध्यान नहीं रखा जाता है।
शोध कार्य के लिए अल्मोड़ा पहुंची नीलाक्षी का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में सुरक्षित जमीन मिलना काफी मुश्किल है। पहाड़ों में जमीन के लिए कोई कंट्रोलिंग सिस्टम नहीं है। यानि कि भवन बनाने के लिए लोग जमीन के प्रति बेपरवाह रहते हैं। जबकि जर्मनी से सटे स्विट्जरलैंड में जमीन या भवन बनाने के लिए तीन जोन बने हुए हैं। ग्रीन, रेड और आरेंज। दूसरा ड्रेनेज सिस्टम की समस्या पहाड़ों में लगातार घटती जा रही है। प्राइवेट के अलावा सरकारी आवासों में तक ड्रेनेज की सुविधा नहीं है और सड़कों पर पानी बहता है। उनका मानना है कि पहाड़ों में मकान आपस में इतने चिपके हुए हैं कि आपदा, भूकंप जैसी स्थिति आने पर लोगों को बचाना जोखिम भरा काम है।
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नीलाक्षी ने बताया कि लोग नौलों और गधेरों का महत्व भूल गए हैं। पानी के स्रोतों के पास अधिकतर मकान बने हैं। उन्होंने बताया कि अब हिमालय पर शोध अंतर्राष्ट्रीय एजेंडा बन चुका है। और दुनियाभर के विशेषज्ञ हिमालयी राज्यों में अनियोजित विकास को लेकर चिंतित हैं। वह बताती हैं कि लोगों को इस विषय पर जागरूक होना पड़ेगा। समतल और बेस में ठोस पत्थर वाली जमीन सुरक्षित होती है। जमीन का झुकाव 30 डिग्री कम होना चाहिए और जमीन के दांए, बाएं या नीचे पानी नहीं होना चाहिए। उन्होंने बताया कि वह अपने किए गए शोध से निकले सुझाव पालिका और शहरी विकास विभाग को देंगी। उसके बाद अप्रेल माह में जर्मनी जाने के बाद विश्वविद्यालय को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगी।
नीलाक्षी जोशी का अल्मोड़ा से गहरा लगाव भी रहा है। वह कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे की पर पोती हैं। वर्तमान में परिवार समेत लखनऊ में रहती हैं। नीलाक्षी के पिता सेना से सेवानिवृत्त और मां शिक्षिका रही हैं। जबकि बड़ा भाई प्रशांत जोशी लंदन में एक बैंक में कार्यरत है। नीलाक्षी बताती हैं कि उनका पहाड़ में कभी कभी आना होता है। रांची में आर्किटेक्ट से बैचलर डिग्री का कोर्स करने के बाद नीलाक्षी ने आईआईटी रुड़की से मास्टर्स की डिग्री ली।
पढ़ाई में अव्वल रहने के कारण आईआईटी रुड़की द्वारा उनको 2013 में जर्मनी भेजा गया। उसके बाद 2016 में नीलाक्षी का दोबारा जर्मनी जाना हुआ। जहां वह वर्तमान में टेक्रिकल युनिवर्सिटी ड्रेसडेन से हिमालयी क्षेत्रों में अनियोजित विकास के खतरे विषय पर शोध कर रही हैं। जिसके चलते उन्होंने भारत आकर पहाड़ का रुख किया। उनके इस कार्य में उनकी शिक्षिका माता भी सहयोग कर रही हैं।
है और न ड्रेनेज सिस्टम।
बिल्डिंग इंडस्ट्री कंट्रोल में नहीं होने से लोग पहाड़ों की जमीन को मैदानी जमीन जैसा ही समझ कर बिना मानकों को पूरा किए अंधाधुंध तरीके से भवन निर्माण कर रहे हैं। जो कि भविष्य में पहाड़ों में बड़े खतरे आने का संकेत दे रहा है। उन्होंने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में 80 प्रतिशत मकानों में मानकों का ध्यान नहीं रखा जाता है।
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शोध कार्य के लिए अल्मोड़ा पहुंची नीलाक्षी का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में सुरक्षित जमीन मिलना काफी मुश्किल है। पहाड़ों में जमीन के लिए कोई कंट्रोलिंग सिस्टम नहीं है। यानि कि भवन बनाने के लिए लोग जमीन के प्रति बेपरवाह रहते हैं। जबकि जर्मनी से सटे स्विट्जरलैंड में जमीन या भवन बनाने के लिए तीन जोन बने हुए हैं। ग्रीन, रेड और आरेंज। दूसरा ड्रेनेज सिस्टम की समस्या पहाड़ों में लगातार घटती जा रही है। प्राइवेट के अलावा सरकारी आवासों में तक ड्रेनेज की सुविधा नहीं है और सड़कों पर पानी बहता है। उनका मानना है कि पहाड़ों में मकान आपस में इतने चिपके हुए हैं कि आपदा, भूकंप जैसी स्थिति आने पर लोगों को बचाना जोखिम भरा काम है।
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नीलाक्षी ने बताया कि लोग नौलों और गधेरों का महत्व भूल गए हैं। पानी के स्रोतों के पास अधिकतर मकान बने हैं। उन्होंने बताया कि अब हिमालय पर शोध अंतर्राष्ट्रीय एजेंडा बन चुका है। और दुनियाभर के विशेषज्ञ हिमालयी राज्यों में अनियोजित विकास को लेकर चिंतित हैं। वह बताती हैं कि लोगों को इस विषय पर जागरूक होना पड़ेगा। समतल और बेस में ठोस पत्थर वाली जमीन सुरक्षित होती है। जमीन का झुकाव 30 डिग्री कम होना चाहिए और जमीन के दांए, बाएं या नीचे पानी नहीं होना चाहिए। उन्होंने बताया कि वह अपने किए गए शोध से निकले सुझाव पालिका और शहरी विकास विभाग को देंगी। उसके बाद अप्रेल माह में जर्मनी जाने के बाद विश्वविद्यालय को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगी।
नीलाक्षी जोशी का अल्मोड़ा से गहरा लगाव भी रहा है। वह कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे की पर पोती हैं। वर्तमान में परिवार समेत लखनऊ में रहती हैं। नीलाक्षी के पिता सेना से सेवानिवृत्त और मां शिक्षिका रही हैं। जबकि बड़ा भाई प्रशांत जोशी लंदन में एक बैंक में कार्यरत है। नीलाक्षी बताती हैं कि उनका पहाड़ में कभी कभी आना होता है। रांची में आर्किटेक्ट से बैचलर डिग्री का कोर्स करने के बाद नीलाक्षी ने आईआईटी रुड़की से मास्टर्स की डिग्री ली।
पढ़ाई में अव्वल रहने के कारण आईआईटी रुड़की द्वारा उनको 2013 में जर्मनी भेजा गया। उसके बाद 2016 में नीलाक्षी का दोबारा जर्मनी जाना हुआ। जहां वह वर्तमान में टेक्रिकल युनिवर्सिटी ड्रेसडेन से हिमालयी क्षेत्रों में अनियोजित विकास के खतरे विषय पर शोध कर रही हैं। जिसके चलते उन्होंने भारत आकर पहाड़ का रुख किया। उनके इस कार्य में उनकी शिक्षिका माता भी सहयोग कर रही हैं।