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बंदरों ने मक्का की फसल को बर्बाद किया, सब्जियों को कर रहे हैं चट
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बंदरों द्वारा क्षतिग्रस्त की गई मक्का की फसल।
- फोटो : ALMORA
अल्मोड़ा/रानीखेत। जिले के ग्रामीण इलाकों में बंदरों, सुअरों का आतंक बढ़ गया है। इन जानवरों ने मक्का की फसल तक बर्बाद कर दी है। जंगली जानवर सब्जियों की फसल को भी बर्बाद कर रहे हैं। सब्जी उत्पादन से किसान घर का खर्चा निकाल लेते थे पर अब बीज की लागत भी नहीं निकल पा रही है। किसानों का कहना है कि इन जानवरों की वजह से खेती घाटे का सौदा बन गई है। किसानों का कहना है कि सरकार को इन जानवरों से निपटने के लिए वादे नहीं ठोस नीति बनानी चाहिए।
जिले के सैनोली, कनोली, कुटौली, ज्वारनेड़ी, गौलीमहर, कपकोट, ठाठ, सिरसोड़ा, तिवारी जाख, धुरा संग्रौली, चायखान, कनरा, जलना, तुलेड़ी, कल्टानी, टकोली, बघाड़, बलिया, बैगनिया, गैलाकोट, लमकोट, स्यूनानी, बचकांडे, दुबरौली, ध्यूलीजाख समेत तमाम गांवों में बंदरों ने मक्का की फसल को बर्बाद कर दिया है। बंदर शिमला मिर्च, मिर्च, बैगन, करेला, तुरई, लौकी, कद्दू, बीन, पहाड़ी मूली समेत तमाम तरह की सब्जियों को बर्बाद करने के साथ चुन-चुनकर खा रहे हैं। किसान बताते हैं कि सब्जी उत्पादन से पहले अच्छी आय होती थी लेकिन बंदरों की वजह से खेती घाटे का सौदा बन गई है। बंदर, सूअरों के आतंक से परेशान किसान खेती छोड़कर अन्य रोजगार तलाश रहे हैं।
क्या कहते हैं किसान
खेती ही एक मात्र आय का जरिया है। बंदरों और सूअरों की वजह से किसानों की सालभर की मेहनत बेकार चली जाती है। सरकार को जंगली जानवरों के आतंक से निपटने के लिए कारगर योजना बनानी चाहिए।
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अमरनाथ सिंह, गौलीमहर (अल्मोड़ा)
इस बार मक्का की फसल अच्छी हुई थी। किसान खुश थे। पर बंदरों के झुंड ने खेतों में घुसकर मक्का की खेती बर्बाद कर दी। बंदरों, सूअरों से छुटकारा दिलाने के लिए सरकार को ठोस योजना बनानी चाहिए।
दीवान सिंह, हाथीखान (लमगड़ा)
क्षेत्र के कई किसान सब्जी उत्पादन से ही आजीविका चलाते हैं लेकिन बंदरों की ओर से सब्जियों को बर्बाद कर दिया गया है। जंगली जानवरों से बर्बाद हुई फसल का मुआवजा किसानों को मिलना चाहिए।
हरेंद्र सिंह नगरकोटी, हाथीखान लमगड़ा
चक बंदी की भी मांग
रानखेत। जंगली पशुओं के आतंक से लोगों ने खेती छोड़ दी है और आज सोना उगलने वाले खेत बंजर पड़े हैं। सरकार ने जंगली जानवरों से निपटने के लिए कोई भी ठोस नीति नहीं लाई है। इस स्थिति में कई संगठन चकबंदी करने की मांग करने लगे हैं। लोगों का कहना है कि सभी लोग अपने खेतों की देखरेख कर सकें इसलिए चकबंदी जरूरी है।
पहाड़ की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के बीच किसानों के पलायन की बड़ी वजह बिखरी जोत भी है। गगास घाटी के काश्तकार राजेंद्र बिष्ट का कहना है कि बंदर और सूअरों को लेकर ठोस नीति नहीं बन रही है। साल भर की मेहनत पर जानवर पानी फेर देते हैं। किसानों को लाखों का नुकसान होता है। द्वाराहाट के काश्तकार भुवन भट्ट का कहना है कि पहाड़ में सिंचाई की व्यवस्था नहीं हो पाती, ऊपर से जंगली जानवरों का आतंक। इन हालातों में कैसे खेती करें समझ नहीं आ रहा है। जनप्रतिनिधि भी चुनाव के वक्त इस मुद्दे को उठाते हैं, इसके बाद लोग भूल जाते हैं।
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जिले के सैनोली, कनोली, कुटौली, ज्वारनेड़ी, गौलीमहर, कपकोट, ठाठ, सिरसोड़ा, तिवारी जाख, धुरा संग्रौली, चायखान, कनरा, जलना, तुलेड़ी, कल्टानी, टकोली, बघाड़, बलिया, बैगनिया, गैलाकोट, लमकोट, स्यूनानी, बचकांडे, दुबरौली, ध्यूलीजाख समेत तमाम गांवों में बंदरों ने मक्का की फसल को बर्बाद कर दिया है। बंदर शिमला मिर्च, मिर्च, बैगन, करेला, तुरई, लौकी, कद्दू, बीन, पहाड़ी मूली समेत तमाम तरह की सब्जियों को बर्बाद करने के साथ चुन-चुनकर खा रहे हैं। किसान बताते हैं कि सब्जी उत्पादन से पहले अच्छी आय होती थी लेकिन बंदरों की वजह से खेती घाटे का सौदा बन गई है। बंदर, सूअरों के आतंक से परेशान किसान खेती छोड़कर अन्य रोजगार तलाश रहे हैं।
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क्या कहते हैं किसान
खेती ही एक मात्र आय का जरिया है। बंदरों और सूअरों की वजह से किसानों की सालभर की मेहनत बेकार चली जाती है। सरकार को जंगली जानवरों के आतंक से निपटने के लिए कारगर योजना बनानी चाहिए।
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अमरनाथ सिंह, गौलीमहर (अल्मोड़ा)
इस बार मक्का की फसल अच्छी हुई थी। किसान खुश थे। पर बंदरों के झुंड ने खेतों में घुसकर मक्का की खेती बर्बाद कर दी। बंदरों, सूअरों से छुटकारा दिलाने के लिए सरकार को ठोस योजना बनानी चाहिए।
दीवान सिंह, हाथीखान (लमगड़ा)
क्षेत्र के कई किसान सब्जी उत्पादन से ही आजीविका चलाते हैं लेकिन बंदरों की ओर से सब्जियों को बर्बाद कर दिया गया है। जंगली जानवरों से बर्बाद हुई फसल का मुआवजा किसानों को मिलना चाहिए।
हरेंद्र सिंह नगरकोटी, हाथीखान लमगड़ा
चक बंदी की भी मांग
रानखेत। जंगली पशुओं के आतंक से लोगों ने खेती छोड़ दी है और आज सोना उगलने वाले खेत बंजर पड़े हैं। सरकार ने जंगली जानवरों से निपटने के लिए कोई भी ठोस नीति नहीं लाई है। इस स्थिति में कई संगठन चकबंदी करने की मांग करने लगे हैं। लोगों का कहना है कि सभी लोग अपने खेतों की देखरेख कर सकें इसलिए चकबंदी जरूरी है।
पहाड़ की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के बीच किसानों के पलायन की बड़ी वजह बिखरी जोत भी है। गगास घाटी के काश्तकार राजेंद्र बिष्ट का कहना है कि बंदर और सूअरों को लेकर ठोस नीति नहीं बन रही है। साल भर की मेहनत पर जानवर पानी फेर देते हैं। किसानों को लाखों का नुकसान होता है। द्वाराहाट के काश्तकार भुवन भट्ट का कहना है कि पहाड़ में सिंचाई की व्यवस्था नहीं हो पाती, ऊपर से जंगली जानवरों का आतंक। इन हालातों में कैसे खेती करें समझ नहीं आ रहा है। जनप्रतिनिधि भी चुनाव के वक्त इस मुद्दे को उठाते हैं, इसके बाद लोग भूल जाते हैं।