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गीतों के जरिये लोक संस्कृति बचा रहे लोक गायक धरम दा
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Calture in almora by Dharam da
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अल्मोड़ा। लोक कलाकार और गायक धरम सिंह नेगी ‘धरम दा’ विलुप्त होती कुमाऊंनी लोक संस्कृति को गीतों के जरिये संरक्षित करने में जुटे हैं। उन्होंने नए गीत की रचना की है। इस गीत के जरिये वह वह लोगों को अपनी संस्कृति से जुड़े रहने और इसे बचाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
भैंसियाछाना ब्लॉक के रीम गांव निवासी धरम सिंह नेगी कुमाऊंनी लोक संस्कृति के बदलते स्वरूप को लेकर काफी चिंचित हैं। उन्होंने ‘कां हराई ग्याना म्यर पहाड़ा रीति-रिवाजा शकुनाआंखर हराई .. नाम से एक नया गीत बनाया है।
जिसमें उन्होंने कुमाऊं की समृद्ध लोककला, संस्कृति के वैभवशाली इतिहास को बताया है। साथ ही यह भी चिंता जताई है कि नई पीढ़ी अपनी लोक संस्कृति, लोक कला को भूलती जा रही है।
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वह गीतों के जरिये लोगों में लोक संस्कृति को संरक्षित करने की अलख जगा रहे हैं। संवाद न्यूज एजेंसी से हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी लोककला, लोक संस्कृति को भूलते जा रही है।
स्थिति यह है कि शुभ कार्यों में भी शकुन आंखर गीत अब कम सुनाई देते हैं। इनका स्थान धीरे-धीरे फिल्मी गीत ले रहे हैं। ढोल, दमाऊ, मशकबीन का प्रचलन भी कम होते जा रहा है। इनके स्थान पर बैंडबाजा चलन में आ गया है। गांव के आंगनों में अब ओखल नहीं दिखते हैं।
इनकी जगह धान कूटने वाली मशीनें आ गई हैं। उत्तराखंड के पारंपरिक परिधान घाघरा, आंगड़ी समेत सुत, धागुल, त्रिपली जंजीर आदि आभूषण भी प्रचलन से बाहर हो गए हैं।
उन्होंने कहा कि लोक परंपरा और लोक संस्कृति को धरोहर के रूप में संजोने की आवश्यकता है। साथ ही पुरानी पीढ़ी की यह जिम्मेदारी है कि अपनी इस पहचान से नई पीढ़ी को अवगत कराए और पारंगत करें।
लोक वाद्य यंत्र भी विलुप्ति के कगार पर
अल्मोड़ा। धरम सिंह नेगी ने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति के हावी होने से लोक कला, संस्कृति पर ग्रहण लगने लगा है। इसके संरक्षण के प्रयास नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ी इनका नाम भी नहीं जान सकेगी।
सुरीली तान छेड़ने वाले कुमाऊं के लोक वाद्य यंत्र अलगोजा (जौंया मुरूली), बिणाई, नागफनी, इकतारा भौंकर विलुप्ति की कगार पर हैं। रिंगाल के तने से बनने वाली जौंया मुरूली की धुन अब पहाड़ में कहीं नहीं सुनाई देती है।
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भैंसियाछाना ब्लॉक के रीम गांव निवासी धरम सिंह नेगी कुमाऊंनी लोक संस्कृति के बदलते स्वरूप को लेकर काफी चिंचित हैं। उन्होंने ‘कां हराई ग्याना म्यर पहाड़ा रीति-रिवाजा शकुनाआंखर हराई .. नाम से एक नया गीत बनाया है।
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जिसमें उन्होंने कुमाऊं की समृद्ध लोककला, संस्कृति के वैभवशाली इतिहास को बताया है। साथ ही यह भी चिंता जताई है कि नई पीढ़ी अपनी लोक संस्कृति, लोक कला को भूलती जा रही है।
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वह गीतों के जरिये लोगों में लोक संस्कृति को संरक्षित करने की अलख जगा रहे हैं। संवाद न्यूज एजेंसी से हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी लोककला, लोक संस्कृति को भूलते जा रही है।
स्थिति यह है कि शुभ कार्यों में भी शकुन आंखर गीत अब कम सुनाई देते हैं। इनका स्थान धीरे-धीरे फिल्मी गीत ले रहे हैं। ढोल, दमाऊ, मशकबीन का प्रचलन भी कम होते जा रहा है। इनके स्थान पर बैंडबाजा चलन में आ गया है। गांव के आंगनों में अब ओखल नहीं दिखते हैं।
इनकी जगह धान कूटने वाली मशीनें आ गई हैं। उत्तराखंड के पारंपरिक परिधान घाघरा, आंगड़ी समेत सुत, धागुल, त्रिपली जंजीर आदि आभूषण भी प्रचलन से बाहर हो गए हैं।
उन्होंने कहा कि लोक परंपरा और लोक संस्कृति को धरोहर के रूप में संजोने की आवश्यकता है। साथ ही पुरानी पीढ़ी की यह जिम्मेदारी है कि अपनी इस पहचान से नई पीढ़ी को अवगत कराए और पारंगत करें।
लोक वाद्य यंत्र भी विलुप्ति के कगार पर
अल्मोड़ा। धरम सिंह नेगी ने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति के हावी होने से लोक कला, संस्कृति पर ग्रहण लगने लगा है। इसके संरक्षण के प्रयास नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ी इनका नाम भी नहीं जान सकेगी।
सुरीली तान छेड़ने वाले कुमाऊं के लोक वाद्य यंत्र अलगोजा (जौंया मुरूली), बिणाई, नागफनी, इकतारा भौंकर विलुप्ति की कगार पर हैं। रिंगाल के तने से बनने वाली जौंया मुरूली की धुन अब पहाड़ में कहीं नहीं सुनाई देती है।