{"_id":"5a087f2f4f1c1b70548bcad2","slug":"121510506287-almora-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"बंदी के कगार पर है भतरौंजखान की मिर्च व चौलाई मंड़ी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बंदी के कगार पर है भतरौंजखान की मिर्च व चौलाई मंड़ी
Updated Sun, 12 Nov 2017 10:34 PM IST
विज्ञापन
भतरौंजखान (अल्मोड़ा) । ककलासों, तल्ला सल्ट, सिलोर, कोश्यां फल्दाकोट सहित नया क्षेत्र की मिर्च सहित नकदी फसलों को बेचने के लिए प्रसिद्ध भतरौंजखान की पैठ(मंडी) की रौनक अब कम होने लगी है। किसी जमाने में अगस्त से लेकर मार्च के प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को लगने वाली इस मंडी में रामनगर रामपुर स्वार मुरादाबाद सहित दूरदराज का व्यापारी आता था।
यहां पर किसान बिना किसी बिचौलिये के अपनी फसल को बेचता है, लेकिन किसान को उपज पर मेहनत के अनुरूप कीमत नहीं मिल पाने और जंगली जानवरों के नुकसान के चलते किसानों ने अपनी जमीन को बंजर छोड़ दी है। जिसके चलते इसका सीधा प्रभाव भतरौंजखान की इस मंडी पर पड़ा है। दस वर्ष पूर्व की अपेक्षा आज यहां पर एक चौथाई फसल नहीं आ रही है। मुख्य रूप से मिर्च, चौलाई और पहाड़ी दालों के लिए प्रसिद्ध यह मंडी अब नाम मात्र की रह गई है। कम उत्पादन के चलते एक वर्ष से यहां पर मंगलवार को मंडी लगना भी बंद हो गया है।
अदबौड़ा निवासी आनंद सिंह ने बताया कि उनके गांव में सत्तर मवासे रहते हैं। पहले प्रत्येक मवासा साल भर में चालीस हजार से डेढ़ लाख तक की मिर्च, चौलाई और दालें बेचता था, लेकिन अब जंगली जानवरों द्वारा फसल को नुकसान पहुंचाना के कारण लोग बहुत कम फसल बेच पाते हैं।
विज्ञापन
भतरौंज के पूर्व प्रधान लीलाधर पंत ने बताया कि उत्पादन में लागत के अनुरूप फसल नहीं होने और जंगली जानवरों के नुकसान के चलते उनके गांव के अधिकतर लोगों ने खेती छोड़ मजदूरी करना शुरू कर दिया है।
भतरौंजखान सहित रामनगर हल्द्वानी की मंडी में बिल्लेख का प्रसिद्ध आलू इस बार लोगों ने चखा तक नहीं । यहां के किसान बचेसिंह ने बताया कि अत्यधिक मेहनत के बाद कीमत नहीं मिलने और जंगली जानवरों के आतंक से लोगों ने आलू लगाना लगभग बंद कर दिया है।
विज्ञापन
यहां पर किसान बिना किसी बिचौलिये के अपनी फसल को बेचता है, लेकिन किसान को उपज पर मेहनत के अनुरूप कीमत नहीं मिल पाने और जंगली जानवरों के नुकसान के चलते किसानों ने अपनी जमीन को बंजर छोड़ दी है। जिसके चलते इसका सीधा प्रभाव भतरौंजखान की इस मंडी पर पड़ा है। दस वर्ष पूर्व की अपेक्षा आज यहां पर एक चौथाई फसल नहीं आ रही है। मुख्य रूप से मिर्च, चौलाई और पहाड़ी दालों के लिए प्रसिद्ध यह मंडी अब नाम मात्र की रह गई है। कम उत्पादन के चलते एक वर्ष से यहां पर मंगलवार को मंडी लगना भी बंद हो गया है।
विज्ञापन
अदबौड़ा निवासी आनंद सिंह ने बताया कि उनके गांव में सत्तर मवासे रहते हैं। पहले प्रत्येक मवासा साल भर में चालीस हजार से डेढ़ लाख तक की मिर्च, चौलाई और दालें बेचता था, लेकिन अब जंगली जानवरों द्वारा फसल को नुकसान पहुंचाना के कारण लोग बहुत कम फसल बेच पाते हैं।
विज्ञापन
भतरौंज के पूर्व प्रधान लीलाधर पंत ने बताया कि उत्पादन में लागत के अनुरूप फसल नहीं होने और जंगली जानवरों के नुकसान के चलते उनके गांव के अधिकतर लोगों ने खेती छोड़ मजदूरी करना शुरू कर दिया है।
भतरौंजखान सहित रामनगर हल्द्वानी की मंडी में बिल्लेख का प्रसिद्ध आलू इस बार लोगों ने चखा तक नहीं । यहां के किसान बचेसिंह ने बताया कि अत्यधिक मेहनत के बाद कीमत नहीं मिलने और जंगली जानवरों के आतंक से लोगों ने आलू लगाना लगभग बंद कर दिया है।