रागों की खुशबू से महका गंगा तट
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ध्रुपद तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध तुलसी घाट पर कुंवर अनंत नारायण सिंह ने संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र और संस्थापक सदस्य डॉ. राजेश्वर आचार्य के साथ दीप जलाकर किया। कुंवर ने युवा पीढ़ी में ध्रुपद के प्रसार पर जोर दिया। इसके बाद शुरुआत हुई प्रो. ऋत्विक सान्याल के गायन से। उन्होंने राग भूपाली की अवतारणा की। अलापचारी के बाद चौताल में निबद्ध तानसेन की प्रसिद्ध रचना की प्रस्तुति की।
बंदिश के बोल थे- बनि चारो के व्यवहार सुनि लीजिए गुनीजन...। फिर शूलताल में दूसरी बंदिश उन्होंने प्रस्तुत की। पखावज पर जापान के तेस्या कन्हाइको, और सुखद मुंडे ने संगत की। गायन में सहयोग किया रिभु सान्याल ने। इनके बाद काशी के युवा कलाकार पं. देवव्रत मिश्र ने सुरबहार पर राग पुरिया धनाश्री की अवतारणा की। इन्होंने अलापचारी बजाने के बाद शूलताल दस मात्रा में बंदिश के बाद सात मात्रा में तीवरा की प्रस्तुति की। इसके बाद उन्होंने ध्रुपद में कई रचनाएं पेश कीं। पखावज पर संगत की अंकित पारिख ने। इनके बाद डागर बंधु मंच पर आए। तालियों के साथ संगीत प्रेमियों ने उनका स्वागत किया।
नफीसुद्दीन डागर और अनिसुद्दीन डागर ने राग मालकौंश में अलाप के बाद चौताल में निबद्ध रचना प्रस्तुत की। बंदिश के बोल थे-पूजन चली महादेव...। इसके बाद शूलताल 10 मात्रा में बंदिश सुनाकर लोगों को मुग्ध किया। पखावद पर संगत की उद्धव शिंदे ने। तानपूरे पर गायत्री शर्मा थीं। इनके बाद राजखुशी राम ने पखावज पर गणेश परन, शिव परन के अलावा कई पुरानी बंदिशें बजाईं। हारमोनियम परलहरा दिया जमुना वल्लभ दास गुजराती ने। इनके बाद मधुछंदा दत्ता ने ध्रुपद गायन से तालियां बटोरीं।