{"_id":"56df34a44f1c1b3a7e8b45d0","slug":"equipment-together-with-six-female-artist","type":"story","status":"publish","title_hn":"छह दिग्गज महिला कलाकार साज पर एक साथ ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
छह दिग्गज महिला कलाकार साज पर एक साथ
ब्यूरो/अमर उजाला वाराणसी
Updated Wed, 09 Mar 2016 01:53 AM IST
विज्ञापन
शिवरात्रि संगीत महोत्सव
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
देश में शोहरत कमा रहीं महिला कलाकारों की नई पीढ़ी मंगलवार की रात संगीत के बनारस घराने के मंच पर एक साथ नजर आईं। एक साथ छह दिग्गज महिला कलाकारों ने राग रंग से लेकर उत्तर से दक्षिण के रागों-तालों पर अपनी साधना की खुशबू बिखेरी। दुर्गाकुंड स्थित हनुमान प्रसाद पोद्दार अंध विद्यालय में तीन दिवसीय शिवरात्रि संगीत महोत्सव की आखिरी निशा इन कलाकारों की बंदिशों की बेजोड़ प्रस्तुतियों से यादगार बन गई।
नामचीन गुरुओं की शिष्याओं में पं. अजय चक्रवर्ती की पुत्री कौशिकी चक्रवर्ती ने गायन पेश किया तो पं. सुरेश तलवरकर की पुत्री सावनी तलवरकर तबले पर ताल लगा रही थीं। पं. हरिप्रसाद चौरसिया की शिष्या देवोप्रिया चटर्जी बांसुरी पर रहीं तो कथक नृत्य गुरु पं. बिरजू महाराज की शिष्या भक्तिदेश पांडेय ने भावों-ईशारों से थिरकन को संजोया। वायलिन की पर्याय बनीं एम राजम की नतिनी नंदिनी शंकर वायलिन पर थीं तो महिमा उपाध्याय ने पखावज पर बंदिशों को बजाकर भाव विभोर किया।
शीर्ष गुरुओं की इन शिष्याओं ने देर रात मंच संभाला। शुरुआत हुई नमन की कंपोजिंग से। इसके बाद सरस्वती वंदना, फिर रागों-तालों से शिव उपासना की प्रस्तुति हुई। इसके बाद कौशिकी की अगुवाई में त्रिनयनी बंदिश पर सुर-साज सजे। राग-रंग के भावों पर होरी पर तो भक्ति ने नृत्य की थिरकन से खूब तालियां बटोरीं। इसके बाद दक्षिण भारती शैली की बंदिश आंनंदिनी के बाद हंसिनी की मोहक प्रस्तुति हुई। फिर तबला और पखावज की जुगलबंदी में तिहाइयों के साथ गत फर्द, तोड़ा, टुकड़ा, रेला की जोरदार प्रस्तुति हुई।
विज्ञापन
इनसे पहले प्रख्यात कथक नृत्यांगना रहीं सितारा देवी के पौत्र विशाल कृष्ण ने शिव स्तोत्र से नृत्य की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने माखनचोरी पर गतकारी और फिर राधा कृष्ण के बोलचाल की नृत्य के भावों में प्रस्तुति की। सूर के पद- बूझत श्याम कौन तूं गोरी... पर उन्होंने भावपूर्ण नृत्य से लोगों को झुमाया। होरी की बंदिश पर नृत्य से विशाल ने विराम लिया। तबले पर कुशाल कृष्ण, बांसुरी पर शनीश ज्ञावली, सितार पर आनंद मिश्र और बोल पढ़ंत पर संतोष मिश्र ने संगत की। ठुमरी गायक पं. छन्नूलाल मिश्र की मौजूदगी में कथा मर्मज्ञ रमेश भाई ओझा ने कलाकारों को सम्मानित किया। भगीरथ जालान ने धन्यवाद जताया। कृष्ण कुमार जालान ने स्वागत किया। संचालन किया पं. हरिराम द्विवेदी ने।
विज्ञापन
नामचीन गुरुओं की शिष्याओं में पं. अजय चक्रवर्ती की पुत्री कौशिकी चक्रवर्ती ने गायन पेश किया तो पं. सुरेश तलवरकर की पुत्री सावनी तलवरकर तबले पर ताल लगा रही थीं। पं. हरिप्रसाद चौरसिया की शिष्या देवोप्रिया चटर्जी बांसुरी पर रहीं तो कथक नृत्य गुरु पं. बिरजू महाराज की शिष्या भक्तिदेश पांडेय ने भावों-ईशारों से थिरकन को संजोया। वायलिन की पर्याय बनीं एम राजम की नतिनी नंदिनी शंकर वायलिन पर थीं तो महिमा उपाध्याय ने पखावज पर बंदिशों को बजाकर भाव विभोर किया।
विज्ञापन
शीर्ष गुरुओं की इन शिष्याओं ने देर रात मंच संभाला। शुरुआत हुई नमन की कंपोजिंग से। इसके बाद सरस्वती वंदना, फिर रागों-तालों से शिव उपासना की प्रस्तुति हुई। इसके बाद कौशिकी की अगुवाई में त्रिनयनी बंदिश पर सुर-साज सजे। राग-रंग के भावों पर होरी पर तो भक्ति ने नृत्य की थिरकन से खूब तालियां बटोरीं। इसके बाद दक्षिण भारती शैली की बंदिश आंनंदिनी के बाद हंसिनी की मोहक प्रस्तुति हुई। फिर तबला और पखावज की जुगलबंदी में तिहाइयों के साथ गत फर्द, तोड़ा, टुकड़ा, रेला की जोरदार प्रस्तुति हुई।
विज्ञापन
इनसे पहले प्रख्यात कथक नृत्यांगना रहीं सितारा देवी के पौत्र विशाल कृष्ण ने शिव स्तोत्र से नृत्य की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने माखनचोरी पर गतकारी और फिर राधा कृष्ण के बोलचाल की नृत्य के भावों में प्रस्तुति की। सूर के पद- बूझत श्याम कौन तूं गोरी... पर उन्होंने भावपूर्ण नृत्य से लोगों को झुमाया। होरी की बंदिश पर नृत्य से विशाल ने विराम लिया। तबले पर कुशाल कृष्ण, बांसुरी पर शनीश ज्ञावली, सितार पर आनंद मिश्र और बोल पढ़ंत पर संतोष मिश्र ने संगत की। ठुमरी गायक पं. छन्नूलाल मिश्र की मौजूदगी में कथा मर्मज्ञ रमेश भाई ओझा ने कलाकारों को सम्मानित किया। भगीरथ जालान ने धन्यवाद जताया। कृष्ण कुमार जालान ने स्वागत किया। संचालन किया पं. हरिराम द्विवेदी ने।