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अहंकार जाने पर ही मिलेगा निरंकार
ब्यूरो/ अमर उजाला, सिद्धार्थनगर
Updated Sun, 13 Mar 2016 11:09 PM IST
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सिद्धार्थनगर में आयोजित संत निरंकारी के कार्यक्रम में मौजूद लोग।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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संत निरंकारी मिशन का साप्ताहिक सत्संग रविवार को मंडी परिषद के परिसर में हुआ। इसमें पीपीगंज से आईं महात्मा विमला देवी ने सत्संग करते हुए निरंकार की प्राप्ति का तरीका बताया। उन्होंने कहा कि निरंकार को पाने के लिए अहंकार का त्याग ही सबसे उत्तम मार्ग है।
उन्होंने कहा कि प्रभु परमात्मा को जानना, पाना व उसका गुणगान करना हर युग में सहारा लिया गया। सतयुग में ध्यान से परमात्मा का दर्शन मिला। त्रेता युग में यज्ञ से पाया गया। द्वापर में पूजा करने से परमात्मा को जानने का अवसर मिला।
इस कलयुग में परमात्मा को पाने के लिए सिर्फ नाम का सहारा लेना पड़ा। वह नाम वस्तु हैं वस्तु ही ब्रह्म हैं। ब्रह्म ही सत्य हैं बाकी सब मिथ्या है, परिवर्तन शील है। जिस नाम से जन्म मरण से मुक्ति मिलती हैं। उन्होंने बताया कि गुरु सीख में इतनी ताकत होती है कि सवा लाख पापियों को एक निरंकारी तारने के लिए पर्याप्त है। जिस किसी को यह दर्शन मिलता है, उसके अंदर से सभी विकार दूर हो जाते हैं।
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उसे संसार के हर घट में परमात्मा ही नजर आता है। मात्र सतगुरु के शरण में आकर ही ब्रह्म को जान सकते हैं। आज सतगुरु बाबा हरदेव सिंह महराज जी सभी प्रकार के नशे से परहेज की बात करते हैं, क्योंकि स्वस्थ्य तन में ही ब्रह्म का ज्ञान रुकता है। जब गुरु मिलेगा और परमात्मा का दर्शन कराएगा तब जा कर मुक्ति मिलेगी।
उस घट को मरा हुआ जान लो, जिसके अंदर प्रेम की जागृति न हो। जिन्हें प्रेम चाहिए उन्हें अहंकार रूपी शीश को झुकाना पड़ेगा। कार्यक्रम के आयोजक मुखी डा.राजाराम यादव ने महात्माओं का स्वागत करते हुए सभी को गुरु की सिखलाई को अपने जीवन में उतारने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में महात्मा डॉ.सुनील श्रीवास्तव, रामू यादव, बबलू, मोतीलाल, राजेश कुमार, साधना पासवान, कविता, रेनू, सुषमा वर्मा, कमलावती, शांति, रामाकांत, संतोला, सरिता यादव, सत्यम, नीरज, नीलकमल, आशीष, नंदलाल वर्मा, सीताराम, कलावती, अनूप पासवान, पार्वती, गीता, धर्मा, राजेंद्र यादव, अंकित आदि मौजूद रहे। संचालन किरन श्रीवास्तव ने किया।
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उन्होंने कहा कि प्रभु परमात्मा को जानना, पाना व उसका गुणगान करना हर युग में सहारा लिया गया। सतयुग में ध्यान से परमात्मा का दर्शन मिला। त्रेता युग में यज्ञ से पाया गया। द्वापर में पूजा करने से परमात्मा को जानने का अवसर मिला।
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इस कलयुग में परमात्मा को पाने के लिए सिर्फ नाम का सहारा लेना पड़ा। वह नाम वस्तु हैं वस्तु ही ब्रह्म हैं। ब्रह्म ही सत्य हैं बाकी सब मिथ्या है, परिवर्तन शील है। जिस नाम से जन्म मरण से मुक्ति मिलती हैं। उन्होंने बताया कि गुरु सीख में इतनी ताकत होती है कि सवा लाख पापियों को एक निरंकारी तारने के लिए पर्याप्त है। जिस किसी को यह दर्शन मिलता है, उसके अंदर से सभी विकार दूर हो जाते हैं।
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उसे संसार के हर घट में परमात्मा ही नजर आता है। मात्र सतगुरु के शरण में आकर ही ब्रह्म को जान सकते हैं। आज सतगुरु बाबा हरदेव सिंह महराज जी सभी प्रकार के नशे से परहेज की बात करते हैं, क्योंकि स्वस्थ्य तन में ही ब्रह्म का ज्ञान रुकता है। जब गुरु मिलेगा और परमात्मा का दर्शन कराएगा तब जा कर मुक्ति मिलेगी।
उस घट को मरा हुआ जान लो, जिसके अंदर प्रेम की जागृति न हो। जिन्हें प्रेम चाहिए उन्हें अहंकार रूपी शीश को झुकाना पड़ेगा। कार्यक्रम के आयोजक मुखी डा.राजाराम यादव ने महात्माओं का स्वागत करते हुए सभी को गुरु की सिखलाई को अपने जीवन में उतारने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में महात्मा डॉ.सुनील श्रीवास्तव, रामू यादव, बबलू, मोतीलाल, राजेश कुमार, साधना पासवान, कविता, रेनू, सुषमा वर्मा, कमलावती, शांति, रामाकांत, संतोला, सरिता यादव, सत्यम, नीरज, नीलकमल, आशीष, नंदलाल वर्मा, सीताराम, कलावती, अनूप पासवान, पार्वती, गीता, धर्मा, राजेंद्र यादव, अंकित आदि मौजूद रहे। संचालन किरन श्रीवास्तव ने किया।