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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष

Mon, 07 Mar 2016 11:21 PM IST
Auraiya, Uttar pradesh, India
Auraiya, Uttar pradesh, India Updated Mon, 07 Mar 2016 11:21 PM IST
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International Women's Day Special
परिवार के साथ बैठी सुषमा - फोटो : amar ujala beuro
सामाजिक जिम्मेदारी हो या घर की मर्यादा आडंबरों को दर किनार कर महिलाओं ने अपनी जीवटता, मेहनत और आत्म विश्वास से न केवल अपना बल्कि अपने परिवार को भी समाज में मुकाम हासिल कराया है। शिक्षा का क्षेत्र हो या राजनीति का जिले की महिलाओं ने हर ओर कदम बढ़ाए हैं। हम होेंगे कामयाब एक दिन की सकारात्मक सोच के साथ उन्होंने सभी जगह अपनी दम का लोहा मनवाया।
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महिला सामाख्या ने बनाया कारवां
महिलाओं को कमजोर समझने के समाज में फैले भ्रम को तोड़कर महिला समाख्या की कंचन तिवारी ने हजारों महिलाआें को स्वावलंबी बनाने में महती भूमिका निभाई है। कंचन ने महिला सामाख्या से जुड़कर न केवल गरीबी की चपेट में आए अपने परिवार को दो जून की रोटी की जुगाड़ बनाई। बल्कि अपने ही जैसी बेसहारा, अशिक्षित व गरीब दो हजार महिलाओं को कुटीर उद्योग से जोड़कर उनके स्तर को ऊंचा उठाया। उन्होंने बताया कि महिला सामाख्या 1996 में जिले में आई थी। तब से वह संस्था से जुड़ी हैं। संस्था महिला जागरूकता, किशोरी स्वास्थ्य एवं शिक्षा के अलावा भैंस पालन, बकरी पालन, सामूहिक खेती, टेंट हाउस, बैग निर्माण, झोला निर्माण आदि तमाम रोजगाराें के माध्यम से महिलाआें को स्वावलंबी बना रही हैं।
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संघर्ष किया और कायम की मिसाल
मुरादगंज। सालों संघर्ष करने के बाद आज एक इंजीनियर बेटी की मां कहलाना संगीता को गर्व का अनुभव कराता है। 37 वर्षीय संगीता ने अपने दो पतियों की मौत के बाद भी जीवन में कभी हिम्मत नहीं हारी। हालांकि हालातों की मार से वह पूरी तरह से टूट गई। इसके बाद भी सिलाई कढ़ाई कर अपने छह बच्चों के परिवार को पाला। उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि आज उनकी बेटी पारुल को मैकेनिकल इंजीनियरिंग है। उन्होंने कहा कि उनके साथ जो बीता है वह भगवान किसी दूसरे को न दे।
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नहीं हारी हिम्मत, बनीं प्रधान
35 साल पहले ब्याह कर गांव आईं बढ़ेरा गांव की विद्या सिंह ने सेंगर बताती हैं कि यहां ड्योढ़ी के बाहर झांकना तक मुश्किल था। पुरुषों की इजाजत के बिना कुछ संभव नहीं था। जब उन्होंने प्रधानी के चुनाव की ससुराल में चर्चा की तो मानो भूचाल सा आ गया हो, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। विरोध के बावजूद प्रधानी का चुनाव लड़ीं और जीत भी हासिल की। आज वह मनरेगा की जिला को-आर्डिनेटर भी हैं।
 
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