बिहार की सियासी उठापटक: नीतीश सबके हैं, आगे सबके बने रहने की होगी चुनौती
नीतीश ने बिहार से दिल्ली को आंखें दिखाकर भले दिल्ली पर निगाहें टिका रखी हों लेकिन बिहार से दिल्ली तक आगे नीतीश के लिए सबके हैं या सब के बने रहने की राह आसान नहीं है। जाहिर है, 2024 के लोकसभा चुनाव हों या 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव, इन दोनों से पहले बिहार में शह-मात के नये-नये सियासी दांव नजर आएंगे।
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क्रांति की धरती बिहार में अगस्त क्रांति के दिन पलटी मार कर नीतीश कुमार ने सत्ता की बाजी एक बार फिर पलट दी। क्रांति का नया स्वर बुलंद कर दिया। नीतीश ने सियासी गुल खिला कर कमल को मुरझा दिया। हालांकि अब नीतीश की चुनौतियां और ज्यादा बढ़ गई हैं। नीतीश सबके हैं लेकिन क्या आगे भी वह बिहार से दिल्ली तक सबके बने रह पाएंगे, यही उनके लिए बड़ी चुनौती होगी।
दरअसल, एक तरफ, नीतीश के सामने सबके बने रहने की चुनौती है तो दूसरी ओर भाजपा के सामने सबका साथ, सबका विकास के मंत्र का टोटा है।
बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान एक पोस्टर खूब चर्चा में था- नीतीश सबके हैं। यही पोस्टर फिर पटना की सड़कों पर नजर आया। गठबंधन से महागठबंधन की ओर पलटी मार कर नीतीश ने फिर से साबित कर दिया है कि वह सबके हैं लेकिन अब उनके सामने आगे भी सब के बने रहने की चुनौती होगी।
बिहार की सियासी बिसात पर नीतीश ने बाजी पलट दी है और शह-मात के खेल में गुल खिलाते हुए कमल को मुरझा दिया है। क्रांति की धरती बिहार से अगस्त क्रांति के दिन नई सियासी क्रांति की पटकथा लिखी गई।
नीतीश ने बिहार से दिल्ली को आंखें दिखाकर भले दिल्ली पर निगाहें टिका रखी हों लेकिन बिहार से दिल्ली तक आगे नीतीश के लिए सबके हैं या सब के बने रहने की राह आसान नहीं है।
जाहिर है, 2024 के लोकसभा चुनाव हों या 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव, इन दोनों से पहले बिहार में शह-मात के नये-नये सियासी दांव नजर आएंगे। नीतीश के सामने अब बिहार से लेकर दिल्ली तक सबके बने रहने की चुनौती है तो भाजपा के सामने सबका साथ, सबका विकास के मंत्र का टोटा है।
नीतीश की चुनौतियां और चुनावों का दौर
बिहार में बुधवार को नीतीश की फिर से मुख्यमंत्री के पद पर आठवीं बार ताजपोशी हो गई। नीतीश ने लालटेन की लौ तेज कर दी है। अपने लिए भी उम्मीदें रौशन की हैं। बिहार में नए मंत्रिमंडल गठन से पहले ही स्पीकर और गृह मंत्री की कुर्सी को लेकर खींचतान की चर्चा तैर गईं।
नीतीश फिर सब (राजद, कांग्रेस, हम, वाम व अन्य) के हैं, लेकिन मंत्रिमंडल में भागीदारी के बाद बिहार में इन सभी सहयोगी दलों के विधायकों को संतुष्ट रख पाना इतना आसान नहीं होगा।
ऐसे में न केवल अकेले जदयू बल्कि राजद-कांग्रेस सरीखी पार्टियों के सामने भी भविष्य में अपने-अपने कुनबे को साथ बचाए रखने की चुनौती होगी।
इन सभी के असंतोष को थामकर नीतीश के लिए सब के हैं...की चुनौती होगी। देर-सबेर महागठबंधन के विधायकों में यदि असंतोष पनपता है तो भाजपा के फायदा उठाने की सियासी कयासबाजी को नकारा नहीं जा सकता है।
तब आरसीपी के कंधे की जरूरत न होगी। जाहिर है कि इस नई सरकार के लिए करीब तीन साल तीन महीने का कार्यकाल पूरा करने की राह निरापद नहीं है। ऐसे में बिहार के राजनीतिक परिदृश्य के नजरिए से भी नीतीश के सामने सबके हैं और सब के बने रहने की चुनौती होगी। नीतीश के सामने बिहार में राजकाज, विधि-व्यवस्था और आर्थिक पटरी पर विकास की रफ्तार को डबल इंजन के बगैर सरपट दौड़ाने की चुनौतियां भी होंगी।
किसी जमाने में जंगल राज और कर्मचारियों-पेंशनभोगियों को वेतन-पेंशन के लाले वाले इस राज्य ने इस कोरोना आपदा के दौरान समूचे देश के लिए मुफ्त वैक्सीन की राह खोली। अब अकेले अपने बूते इन चुनौतियों से नीतीश को बिहार को उबारना होगा। नीतीश के सामने स्पीकर, गृह मंत्री, मंत्रालयों के विभागों का बंटवारा जैसे मुद्दों पर भी महागठबंधन में संतुलन बनाये रखने की चुनौती होगी।
यही कारण है कि बुधवार को भी बाकी मंत्रियों को शपथ नहीं दिलाई गई। फिलहाल, नीतीश-तेजस्वी ने शपथ ली है। नीतीश की स्पीकर बदलने को लेकर भाजपा से जो अनबन हुई थी,वही स्पीकर की कुर्सी दूसरे पाले में देने की लाचारी भी दिख रही है।
नीतीश के लिए दिल्ली अभी दूर
नीतीश के इस सियासी दांव को राजनीतिक गलियारे में भले लोकसभा चुनाव में पीएम उम्मीदवारी के नजरिये से मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा हो,लेकिन नीतीश के लिए दिल्ली अभी दूर दिखती है। इसकी एक वजह यह है कि नीतीश के पीएम उम्मीदवार के कयास भले लगाए जाने लगे हों लेकिन सवाल उठता है कि क्या नीतीश आगे भी सबके बने रह पाएंगे।
क्या क्षेत्रीय क्षत्रप केसीआरराव, शरद पवार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल विपक्ष के एकजुट पीएम उम्मीदवार के तौर पर नीतीश के नाम पर आसानी से मुहर लगा देंगे? क्षेत्रीय दलों की बात तो दूर क्या राष्ट्रीय और सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस इतनी आसानी से पीएम उम्मीदवारी के लिए अपनी दावेदारी छोड़ देगी? ऐसे में 2024 में दिल्ली के लिए शुरुआती दावेदारी या यूं कहें पीएम उम्मीदवारी को लेकर नीतीश के सामने सबके बने रहने की ही असली चुनौती होगी।
हालांकि, शपथ ग्रहण करते ही नीतीश ने विपक्ष के पीएम उम्मीदवारी की ओर इशारा किया- कुछ लोगों को लगता है कि विपक्ष खत्म हो जाएगा। हम लोग विपक्ष में आ गए हैं, 2024 में विपक्ष मन से लड़े। नीतीश ने लोकसभा चुनाव के लिए न केवल विपक्षी एकजुटता की वकालत की बल्कि विधानसभा चुनाव के दौरान अपने साथ चिराग मॉडल के जवाब में लोकसभा चुनाव में बदले के लिए शंखनाद भी कर दिया है।
भाजपा में सबका साथ का टोटा
नीतीश सब के हैं, के साथ भाजपा के सामने भी सब का साथ, सब का विकास वाले मंत्र का टोटा है। पंजाब, बिहार, महाराष्ट्र में एनडीए के साथियों का साथ छूटना इसकी मिसाल है। महाराष्ट्र का मामला सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन है। ऐसे में इतना तय है कि नीतीश के ताजा सियासी दांव से बिहार की 40 लोकसभा सीटों की लड़ाई में भाजपा के सामने बड़ी चुनौतियां होंगी।
लालू के राजद के माई (मुस्लिम-यादव) और नीतीश के सोशल इंजीनियरिंग के साथ-साथ वाम दलों-कांग्रेस के एकजुट गठजोड़ (यदि लोकसभा चुनाव तक महागठबंधन बरकरार रहता है) के सामने भाजपा मैदान में अकेले पड़ जाएगी और उसके सामने 2024 में 2014-2019 के नतीजे दोहराने की चुनौती होगी। जाहिर है, नीतीश और भाजपा के बीच शह-मात का असली खेल तो आगे भी दिखने वाला है लेकिन रोचक यह होगा कि बिहार की जनता किसके साथ होगी, क्योंकि नीतीश-भाजपा को उम्मीद है कि दोनों सब के हैं।
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