नफरत और हिंसा फैलाने वाले पोस्ट के लिए फेसबुक पर कोई जगह नहीं: मार्क जुकरबर्ग

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगातार नफरत, अपराध, सामुहिक हत्या, हिंसा और होलोकॉस्ट को बढ़ावा देने वाले पोस्ट में वृद्धि हो रही है। इसे देखते हुए फेसबुक ने अपनी पॉलिसी अपडेट की है और कहा है कि नफरत, अपराध, सामुहिक हत्या, हिंसा और होलोकॉस्ट को बढ़ावा देने वाले किसी भी पोस्ट या कंटेंट के लिए फेसबुक पर कोई जगह नहीं है। इसकी जानकारी फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने खुद एक पोस्ट के जरिए दी है।
मार्क जुकरबर्ग ने अपनी पोस्ट में लिखा, 'हम हेट स्पीच पॉलिसी को अपडेट कर रहे हैं। हमने ऐसे सभी पोस्ट को हटा दिया है जो नफरत, अपराध, सामुहिक हत्या, हिंसा और होलोकॉस्ट को बढ़ावा देने वाले थे। यदि कोई फेसबुक पर होलोकॉस्ट को सर्च करता है तो हम उसे सही कंटेंट तक ले जाने की कोशिश करेंगे।'
विश्व यहूदी कांग्रेस और अमेरिकी यहूदी समिति ने फेसबुक के इस फैसले का स्वागत किया है। बता दें कि विश्व यहूदी कांग्रेस कई वर्षों से विश्व यहूदी कांग्रेस फेसबुक से होलोकॉस्ट डिनायल सामग्री हटाने की मांग कर रही थी। ऐसे में फेसबुक का यह फैसला उनकी मांग पूरी करने वाला है। बता दें कि होलोकॉस्ट को यहूदी नरसंहार के नाम से भी जाना जाता है।
27 जनवरी को मनाया जाता है होलोकॉस्ट डे
हर साल 27 जनवरी को इस्राइल होलोकास्ट मेमोरियल डे मनाता है। होलोकॉस्ट समूचे यहूदी लोगों को जड़ से खत्म कर देने का सोचा-समझा और योजनाबद्ध प्रयास था। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जर्मनी के तानाशाह अडोल्फ हिटलर ने होलोकास्ट के नाम पर लाखों लोगों को नजरबंदी कैंप में रखा। उनमें से लगभग 11 लाख लोगों को गैस चैम्बर में डालकर मार डाला। दूसरे हजारों लोग नजरबंदी कैंप में ठंड और भुखमरी से मर गए।
1939 में जर्मनी द्वारा विश्व युद्ध भड़काने के बाद हिटलर ने यहूदियों को जड़ से मिटाने के लिए अपने अंतिम हल (फाइनल सोल्यूशन) को अमल में लाना शुरू किया। उसके सैनिक यहूदियों को कुछ खास इलाकों में ठूंसने लगे। उनसे काम करवाने, उन्हें एक जगह इकट्ठा करने और मार डालने के लिए विशेष कैंप स्थापित किए गए, जिनमें सबसे कुख्यात था ऑश्वित्ज।
पोलैंड का ऑश्वित्ज हिटलर की हैवानियत का सबसे बड़ा सेंटर था। यह नाजी हुकूमत का सबसे बड़ा नजरबंदी शिविर था।
सिर्फ जिंदा रहने के लिए मिलता था खाना
नाजी खुफिया एजेंसी एसएस यहां पर यूरोप के सभी देशों से यहूदियों को पकड़कर ले आती थी। जहां पहुंचते ही उनमें से कई लोगों को गैस चेंबर में डालकर मार दिया जाता था। वहीं कई ऐसे भी थे जिन्हें काम करने के लिए जिंदा रखा जाता था। उनकी पहचान मिटाकर उनके हाथ पर एक नंबर अंकित कर दिया जाता था जिससे उनकी पहचान होती थी।
इस दौरान उन्हें मरने तक यातनाएं दी जाती थी।
उनके सिर के बाल उतार लिए जाते थे। कपड़ों की जगह चीथड़े पहना दिए जाते थे। इसके बाद उन्हें बस जिंदा रहने के लिए जरूरी खाना दिया जाता था। इतना ही नहीं उन्हें तब तक यातना दी जाती थी जब तक वे निष्क्रिय नहीं हो जाते थे। युद्ध के छह साल के दौरान नाजियों ने तकरीबन 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी, जिनमें 15 लाख बच्चे थे।