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साइना का चेहरा तक नहीं देखना चाहती थीं वो...
इंटरनेट डेस्क/विक्रांत चतुर्वेदी
Updated Mon, 22 Oct 2012 05:08 PM IST
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भारत में बैडमिंटन का पर्याय बन चुकी साइना नेहवाल को आज कौन नहीं जानता लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब उनके परिवार के सदस्य उनका चेहरा नहीं देखना चाहते थे। वक्त है साइना नेहवाल के पैदा होने के समय का उनकी दादी एक लड़का चाहती थी लेकिन हुई लड़की। इससे नाराज उनकी दादी ने एक माह तक उसका मुंह नहीं देखा। लेकिन आज इस खिलाड़ी को देखने और उससे मिलने के लिए लोग खुशी-खुशी घंटों इंतजार करते रहते है।
आज साइना की प्रतिभा को दुनिया मान चुकी है। सर्वप्रथम उसे पहचानने का कार्य बैडमिंटन कोच पीएसएस ननी प्रसाद राव ने किया था। उन्होंने ही साइना के पिता से आग्रह किया था कि इस बच्ची में प्रतिभा है, आप इसे हर कीमत पर खेलना सिखाइए। साइना नेहवाल ने जब बैडमिंटन रैकेट पकड़ा वह आठ साल की थी, और बैडमिंटन इतना लोकप्रिय नहीं था। उस दौरान जिन खिलाड़ियों को इस दुनिया का बादशाह माना जाता था। उनमे प्रकाश पादुकोण का नाम प्रमुख है।
एक दौर ऐसा भी आया जब साइना के पिता के पास उनका खर्च उठाने का पैसा भी नहीं होता था। लेकिन उन्होंने हमेशा अपनी बच्ची का साथ दिया। एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने बताया कि जब वह साइना को स्कूल में पढ़ाने की सोच रहे थे तो कई ऐसे लोग थे, जिन्होंने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी।
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पुलेला गोपीचंद अकादमी से साइना को काफी मदद मिली और उनके गुरू ने उनकी प्रतिभा को यहीं से पहचाना वह खुद बताते है कि साइना 16-16 घंटे कोर्ट में रहती है। जब कोर्ट को छोड़ती है तो उसे अगले दिन के अभ्यास का इंतजार होता है। उनके गुरु उनकी क्षमता को भगवान की उस पर कृपा मानते है।
आज साइना कई कंपनियों की ब्रांड एम्बेसडर बन चुकी है। दौलत और शोहरत उनके कदम चूम रही है, लेकिन साइना सिर्फ अपने खेल पर ध्यान दे रही है। यही कारण है कि डेनमार्क ओपन में उनके प्रदर्शन ने उन्हें खिताब दिला दिया। वहीं भारत में क्रिकेट खिलाड़ियों के बाद विज्ञापन जगत को अपनी ओर सबसे ज्यादा जिस खिलाड़ी ने आकर्षित किया है वह साइना नेहवाल है।
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आज साइना की प्रतिभा को दुनिया मान चुकी है। सर्वप्रथम उसे पहचानने का कार्य बैडमिंटन कोच पीएसएस ननी प्रसाद राव ने किया था। उन्होंने ही साइना के पिता से आग्रह किया था कि इस बच्ची में प्रतिभा है, आप इसे हर कीमत पर खेलना सिखाइए। साइना नेहवाल ने जब बैडमिंटन रैकेट पकड़ा वह आठ साल की थी, और बैडमिंटन इतना लोकप्रिय नहीं था। उस दौरान जिन खिलाड़ियों को इस दुनिया का बादशाह माना जाता था। उनमे प्रकाश पादुकोण का नाम प्रमुख है।
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एक दौर ऐसा भी आया जब साइना के पिता के पास उनका खर्च उठाने का पैसा भी नहीं होता था। लेकिन उन्होंने हमेशा अपनी बच्ची का साथ दिया। एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने बताया कि जब वह साइना को स्कूल में पढ़ाने की सोच रहे थे तो कई ऐसे लोग थे, जिन्होंने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी।
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पुलेला गोपीचंद अकादमी से साइना को काफी मदद मिली और उनके गुरू ने उनकी प्रतिभा को यहीं से पहचाना वह खुद बताते है कि साइना 16-16 घंटे कोर्ट में रहती है। जब कोर्ट को छोड़ती है तो उसे अगले दिन के अभ्यास का इंतजार होता है। उनके गुरु उनकी क्षमता को भगवान की उस पर कृपा मानते है।
आज साइना कई कंपनियों की ब्रांड एम्बेसडर बन चुकी है। दौलत और शोहरत उनके कदम चूम रही है, लेकिन साइना सिर्फ अपने खेल पर ध्यान दे रही है। यही कारण है कि डेनमार्क ओपन में उनके प्रदर्शन ने उन्हें खिताब दिला दिया। वहीं भारत में क्रिकेट खिलाड़ियों के बाद विज्ञापन जगत को अपनी ओर सबसे ज्यादा जिस खिलाड़ी ने आकर्षित किया है वह साइना नेहवाल है।