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बंद आंख, सूजी एड़ी और फिर भी दीपक पूनिया ने पूछा कोच साहब लड़ लूं

Mon, 23 Sep 2019 11:48 AM IST
अंशुल तलमले स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला Published by: अंशुल तलमले Updated Mon, 23 Sep 2019 11:48 AM IST
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World Wrestling Championship: Success story of New Indian wrestling sensation Deepak Punia
दीपक पूनिया - फोटो : ट्विटर

 दीपक पूनिया के  लिए रविवार की सुबह किसी बुरे सपने से कम नहीं थी। एक आंख पूरी तरह से बंद थी और पैर की एड़ी बुरी तरह सूजी हुई थी। दीपक ने इस बारे में टीम मैनेजमेंट को सूचना तो दी ही साथ में छत्रसाल अखाड़े में अपने कोच विरेंदर सिंह को फोन लगा दिया। विरेंदर की मानें तो दीपक ऐसी स्थिति में भी फाइनल लडने की बात कर रहे थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं करने को कहा।

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कोच से लड़ने का आसरा नहीं मिला तो दीपक ने पिता सुभाष को फोन लगाया। पिता ने छूटते ही कहा सेहत से बढ़कर फाइनल थोड़े ही है। हालांकि बाद में टीम मैनेजमेंट और डॉक्टर ने ही उन्हें लड़ने से रोक दिया। कोच विरेंदर के अनुसार वह बेहद दुखी था और हर हाल में लडना चाहता था, लेकिन उन्होंने उससे कहा कि वह लड़ा तो चोट गहरा जाएगी और आपरेशन तक कराना पड़ सकता है।

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पिता खुद नहीं बन पाए पहलवान बेटे को बनाया

World Wrestling Championship: Success story of New Indian wrestling sensation Deepak Punia
दीपक पूनिया - फोटो : ट्विटर

झज्झर के रहने वाले दीपक के पिता सुभाष को अपने बेटे पर गर्व है। वह भावुक होते हुए कहते हैं कि कभी उन्होंने पहलवान बनने का सपना देखा था, लेकिन घर के हालात ऐसे नहीं थे कि पहलवानी कर पाता। जब घर में खाने के लाले होंगे तो पहलवानी कहां से होती। यही कारण था कि उन्होंने दो बेटियों के बाद जन्में दीपक को छोटी उम्र में ही अखाड़े के राह दिखा दी।

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सुशील, बजरंग को देखकर सीखा

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दीपक पूनिया - फोटो : ट्विटर

कोच विरेंदर खुलासा करते हैं कि दीपक उनके पास 15 की उम्र में आया था, लेकिन इससे पहले वह मिट्टी की कुश्ती के दंगल लड़ता था। पांच सौ से लेकर पांच हजार की ईनामी राशि दीपक के घर का बड़ा सहारा बनती थी, लेकिन उनके पास आने के बाद मिट्टी की कुश्ती बीते दिनों की बात हो गई। उसने छत्रसाल में सुशील कुमार, बजरंग समेत अन्य वरिष्ठ पहलवानों को देखकर कुश्ती के दांवपेच में महारत हासिल की।

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गाय का दूध है दीपक की कमजोरी

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दीपक पूनिया - फोटो : ट्विटर

सुभाष खुलासा करते हैं कि दीपक को बचपन से ही गाय का दूध पसंद है। उन्होंने घर में गाय पाल रखी है और इसी का दूध वह रोजाना दीपक को भिजवाते हैं। वह सिर्फ गाय का ही दूध पीता है। सुभाष को आज भी वह दिन याद है जब दीपक को सेना में लिया गया और जूनियर विश्व चैंपियन बनने के बाद उसके पास पैसे आने लगे। उसने सबसे पहला काम उनके दूध सप्लाई करने के काम को बंद कराया। अब दीपक न तो उन्हें दूध बेचने देता है और न ही खेतों में काम करवाता है। उनका काम तो बस बेटे को गाय दूध, दही और मक्खन पहुंचाना रह गया है।

नौकरी के लिए अखाड़े में उतरे थे दीपक  

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दीपक पूनिया - फोटो : ट्विटर

दीपक ने जब कुश्ती शुरू की थी तब उनका लक्ष्य इसके जरिए नौकरी पाना था जिससे वह अपने परिवार की देखभाल कर सके। वह काम की तलाश में थे और 2016 में उन्हें भारतीय सेना में सिपाही के पद पर काम करने का मौका मिला, लेकिन ओलंपिक पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार ने उन्हें छोटी चीजों को छोड़कर बड़े लक्ष्य पर ध्यान देने का सुझाव दिया। फिर दीपक ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। सुशील ने दीपक को प्रायोजक ढूंढने में मदद की और कहा, ‘कुश्ती को अपनी प्राथमिकता बनाओ, नौकरी तुम्हारे पीछे भागेगी।’ दीपक ने दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम के अपने सीनियर पहलवान की सलाह मानी और तीन साल में आयु वर्ग के कई बड़े खिताब हासिल किए। उनके लिए पिछले तीन साल किसी सपने की तरह रहे हैं।

केतली पहलवान के नाम से हैं मशहूर

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दीपक पूनिया - फोटो : सोशल मीडिया

दीपक के पिता सुभाष 2015 से रोज लगभग 60 किलोमीटर की दूरी तय करके उसके लिए झज्जर से दिल्ली दूध और फल लेकर आते थे। उन्हें बचपन से ही दूध पीना पसंद है। वह गांव में ‘केतली पहलवान’ के नाम से जाने जाते हैं। इसके पीछे भी दिलचस्प कहानी है। गांव के सरपंच ने एक बार केतली में दीपक को दूध पीने के लिए दिया और उन्होंने एक बार में ही उसे खत्म कर दिया। उन्होंने इस तरह एक-एक कर के चार केतली खत्म कर दी जिसके बाद से उनका नाम ‘केतली पहलवान’ पड़ गया।

शॉपिंग के शौकीन हैं दीपक

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Deepak Punia - फोटो : social Media

दीपक ने कहा कि उनकी सफलता का राज अनुशासित रहना है। उन्होंने कहा, ‘मुझे दोस्तों के साथ घूमना, मॉल जाना और शॉपिंग करना पसंद है। लेकिन हमें प्रशिक्षण केंद्र से बाहर जाने की अनुमति नहीं है। मुझे जूते, शर्ट और जींस खरीदना पसंद है, हालांकि मुझे उन्हें पहनने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि मैं हमेशा एक ट्रैक सूट में रहता हूं। टूर्नामेंट के बाद जब भी मुझे मौका मिलता है मैं बाहर जाकर अपना मनपसंद खाना खाता हूं, लेकिन छुट्टी खत्म होने के बाद उसके बारे में सोचता भी नहीं हूं। उसके बाद कुश्ती और प्रशिक्षण ही मेरी जिंदगी होती है। 2015 तक मैं जिला स्तर पर भी पदक नहीं जीत पा रहा था। मैं किसी भी हालत में नतीजा हासिल करना चाहता था ताकि कहीं नौकरी मिल सके और अपने परिवार की मदद कर सकूं। मेरे पिता दूध बेचते थे। वह काफी मेहनत करते थे। मैं किसी भी तरह से उनकी मदद करना चाहता था।’

पिछले साल खरीदी थी एसयूवी

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दीपक पूनिया - फोटो : ट्विटर

मैट पर उनकी सफलता से परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। वह 2018 में भारतीय सेना में नायक सूबेदार के पद पर तैनात हुए। दीपक ने अब पिता को दूध बेचने से भी मना कर दिया। उन्होंने पिछले साल एसयूवी कार खरीदी है। उन्होंने हंसते हुए कहा,‘मुझे यह नहीं पता है कि मैंने कितनी कमाई की है। मैंने कभी उसकी गिनती नहीं की। लेकिन यह ठीक-ठाक रकम है। ‘मैट दंगल’ पर भाग लिए अब काफी समय हो गया, लेकिन मैंने इससे काफी कमाई की और सब खर्च भी किया।’

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